विदूषकः-- तेन हि लघु परित्रायतामेनां भवान् । मा कस्यापि तपस्विन इङ्गदीतैलचिक्कणशौर्षस्य हस्ते पतिष्यति ।
राजा-- परवती खलु तत्रभवती । न च सन्निहितोऽत्र गुरुजनः ।
विदूषकः-अथ भवन्तमन्तरेण कीदृशस्तस्या दृष्टिरागः ?
राजा-निसगदिवाप्रगल्भस्तपस्विकन्याजनः । तथापि तु--
अभिमुखे मयि संहतमीक्षितं हसितमन्यनिमित्तकृतोदयम् । विनयवारितवृत्तिरतस्तया न विवृतो मदनो न च संवृतः ।।
विदूषक:--
तब आप इसको शीघ्र बचायें । (जिससे यह) इङ्कदी के तेल से चिकने शिर वाले किसी तपस्वी के हाथ में न पड़ जाए । अर्थात् अपात्र के हाथ में जाने के पूर्व उसे अपना लो ।
राजा:--
निश्चय ही वह (शकुन्तला) पराधीन है । और उसके पिता (कण्व) यहाँ (आश्रम में) विद्यमान नहीं है ।
विदूषक:--
अच्छा, आप के प्रति उसकी प्रेम-दृष्टि कैसी है ?
राजा:--
तपस्विकन्यायें स्वभाव से ही अप्रगल्भ (भोली-भाली) होती हैं । तो भी मेरे सामने पड़ने पर (वह अपनी) दृष्टि हटा लेती थी (अर्थात् वह आंखों को नीचे कर लेती थी), किसी अन्य कारण को लेकर हंस देती थी (हंस पड़ती थी) इसलिये उस के द्वारा विनय (शील) के द्वारा व्यापार (चेष्टा) विहीन (अपने) (प्रेमभाव) को न प्रकट किया गया और न ही छिपाया गया ।
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