विदूषक:--
(लम्बी सांस लेकर) हे दुर्भाग्य, मृगया (शिकार खेलने) के व्यसनी इस राजा (दुष्यन्त) की मित्रता (वयस्यभाव) से मैं खिन्न हो गया हूं । यह मृग (जा रहा है); यह सूअर (जा रहा है); यह शेर (जा रहा है); इस प्रकार (चिल्लाते हुये) दोपहर में भी गर्मी के कारण विरली वृक्ष-छाया वाले वनप्रदेशो में एक वन से दूसरे वन पे घूमना (भटकना) पड़ता है । (गिरकर सडे हुये पत्तो) के मिश्रण से कड़वा (कसला) तथा कुछ-कुछ गर्म (कदुष्ण) पहाड़ी नदियों का जल पीना पड़ता है । (एक तो) अनिश्चत समय में (और उसमे भी) ऐसा भोजन करना पड़ता है, जिसमे (तप्त) लोह-शलाका (कांटा) पर भने भुने मांस की (ही) अधिकता होती है । घोड़ा दौड़ाने से (हड्डियों के) जोड़ों के हिल जाने से (उत्पन्न पीड़ा के कारण) रात्रि मे भी (मुझे) पर्याप्त सोने को नहीं मिलता । फिर भी (आज तो) बहुत सबेरे ही नीच (दासी के पुत्रौ) बहेलियों (शिकारियो) द्वारा जंगल को घेरने के कोलाहल से जगा दिया गया हूं । इतना होने पर भी अभी पीड़ा (की परम्परा) समाप्त नहीं हो पायी है । अब यह और फोडे पर फोड़ा हो गया है (अर्थात् कष्ट के ऊपर दूसरा कष्ट आ गया है) । (क्योकि) कल हम लोगों के पीछे छूट जाने पर हरिण का पीछा करते-करते तपोवन में प्रविष्ट हुये पूज्य महाराज को, मेरे दुर्भाग्य से तपस्विकन्या शकुन्तला दृष्टिगोचर हो गयी । इस समय (वे) नगर जाने की किसी प्रकार भी इच्छा (मन) नहीं कर रहे हैँ । आज भी (रातभर) उसी (शकुन्तला) के (विषय में) सोचते-सोचते (उनकी) आंखो के सामने (अर्थात् जागते-जागते) सवेरा हो गया । क्या उपाय है (अर्थात् अब मैं क्या करू) ? तब तक (स्नानादि) दैनिक कार्यो से निवृत्त हुये उन से (राजा द्ष्यन्त से) मिलता हूं । (घूमकर और देखकर) हाथ में धनुष ली हई र वनपुष्पों की माला पहनी हई इन यवनियों (परिचारिकाओ) से घिरे हुये मेरे प्रिय मित्र (राजा दुष्यन्त) इधर ही आ रहे हैं । अच्छा, अङ्ग-भङ्ग से व्याकुल-सा होकर (यहां ही) खड़ा होता हूं । सम्भव है, इसी प्रकार (मुझे कुछ) विश्राम मिल जाये । (लकड़ी के डंडे का सहारा लेकर खडा हो जाता है) ।
(तत्पश्चात् निर्दिष्ट रूप में राजा प्रवेश करता है)
राजा:--
(अपने मन में) यद्यपि प्रिय (शकुन्तला) सरलता से प्राप्त होने योग्य नहीं है, तथापि (मेरा) मन उसके प्रेमयुक्त भावों (चेष्टाओं) को देखकर आश्वस्त ( सन्तुष्ट) है । (क्योकि) कामदेव (कामभाव) के सफल न होने पर भी दोनों (प्रेमी एवं प्रेमिका) की (परस्पर) अभिलाषा प्रेम (प्रीति) को उत्पन्न करती है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।