(सोचकर) मित्र, (मेरी) माता के द्वारा तुम (भी) पुत्र की भाँति स्वीकार किये गये हो। (अर्थात् मेरी माता तुम्हें पुत्र की तरह मानती है) । इसलिये आप (तुम) यहाँ से लौटकर मुझको तपस्वियो के कार्य मे व्यस्त मन वाला बताकर पूज्य माता के पुत्र-कार्य को सम्पन्न कर देना ।
विदूषक:--
मुझको राक्षसों से भयभीत तो नहीं गिन रहे (समझ रहे) हो (जिससे मुझे राजधानी भेज रहे हो) ।
राजा:--
(मुस्कराकर) आप के विषय में यह कैसे सम्भव हो सकता है ?
विदूषक:--
(तब तो) जिस प्रकार राजा के अनुज को जाना चाहिये उसी प्रकार जाऊंगा ।
राजा:--
निश्चय ही तपोवन की बाधा बचानी चाहिये (अर्थात् तपोवन में विध्न नहीं होना चाहिए), इसलिए सभी अनुयायियों को तुम्हारे साथ ही भेजता हूँ ।
विदूषक:--
(गर्व के साथ) तब तो अब मैं युवराज (राजकुमार) हो गया हूँ ।
राजा:--
(अपने मन में) यह ब्राह्मण-बालक चंचल है । कहीं (शकुन्तला विषयक) हमारी इच्छा (प्रार्थना) को अन्तःपुर की रानियों से (न) कह दे ! अच्छा, इससे इस प्रकार कहता हूँ । (विदूषक को हाथ से पकड़ कर प्रकट रूप से) मित्र, ऋषियों के महत्व (गौरव) के कारण आश्रम को जा रहा हूँ । वस्तुतः तापसकन्या (शकुन्तला) में मेरी इच्छा (आसक्ति) नही है । देखो मित्र, (भोग-विलास में आसक्त) हम लोग कहाँ ! और हरिण के बच्चों के साथ बढ़ा हुआ (पला हुआ), काम-वासना से अपरिचित (शकुन्तलारूपी) व्यक्ति कहाँ !! (अतः) हंसी (उपहास) मे कही गयी (मेरी) बात को सही रूप में न ग्रहण कर लेना (अर्थात् मेरी बात यथार्थ न समझ लेना) ।
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