विदूषक—
(उसी प्रकार खड़ा होकर ही) हे मित्र, मेरे हाथ-पैर नहीं फैल (चल) रहे हैं।
इसलिए वचन-मात्र से (अर्थात् सीधा खडा होकर हाथ उठाये बिना केवल वाणी से ही)(आप की) जय बोलता हूं।
जय हो, आप की जय हो।
राजा—
यह अंग-भंग कैसे हआ?
विदूषक—
क्यों, स्वयं आंख को व्याकुल करके (अर्थात् आंख मे उंगली डालकर) आप आंसुओं का कारण पूछ रहे हैं?
राजा—
मैं (तुम्हारी बात) नहीं समझ पा रहा हूं।
विदूषक—
हे मित्र, बेंत जो कुबड़े की लीला (अर्थात् टेढ़ा होने की चेष्टा) का अनुकरण करता है, क्या वह अपने प्रभाव से? अथवा नदी के वेग के (प्रभाव से वैसा करता है)?
राजा—
उसमे नदी का वेग कारण है।
विदूषक—
मेरे (कुबड़े की भाँति झुक जाने में) भी आप (कारण हैं)।
राजा—
कैसे?
विदूषक—
इस प्रकार राज-कार्यो को छोडकर ऐसे (हंसक जन्तु से)(भरे हुये) दुर्गम (बीहड़) प्रदेश में जंगली लोगों (वनचर) की भाँति आप का रहना क्या उचित है?
यह सच है कि (वास्तविकता यह है) प्रतिदिन जंगली जानवरों को भगाने (पीछा करने) से ढीले पड़े अंगो के जोड़ वाले (अपने) शरीरावयवों का मैं अब स्वामी नहीं रह गया हूं (अर्थात् मेरे ऊपर कृपा कीजिये)।
एक दिन भी तो विश्राम कीजिये।
राजा—
(अपने मन में) यह (विदूषक) इस प्रकार कह रहा है।
मेरा मन कण्व-पुत्री (शकुन्तला) की स्मृति में शिकार खेलने (मृगया) से उदासीन (विक्लव)(हो रहा है) क्योकि चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा तथा चढ़े हुये बाण वाले इस धनुष को (उन) हरिणो पर चलाने मे मैं समर्थ नहीं हूं, जिन्होने (मेरी) प्रियतमा (शकुन्तला) के सहवास को प्राप्त कर (अर्थात् शकुन्तला के साथ रहकर) मानो (उस शकुन्तला को) भोलेपन से देखने का उपदेश किया है।
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