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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 13
विदूषकः- तेन हि गृहीतचाथेयो भव । कृतं त्वयोपवनं तपोवनमिति पश्यामि । राजा- सखे, तपस्विभिः कैश्चित्‌ परिज्ञातोऽस्मि । चिन्तय तावत्‌ केनापदेशेन पुनराश्रमपदं गच्छामः ? विदूषकः-- कोऽपरोऽपदेशो युष्माकं राज्ञाम्‌ । नीवारषष्ठभाग- मस्माकमुपहरन्त्विति । राजा- मूर्खं, अन्यमेव भागधेयमेते तपस्विनो निर्वपन्ति, यो रत्नराशीनपि विहायाभिनन्द्यते । पश्य-- यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां क्षयि तद्‌ धनम्‌ । तपः षड्‌भागसक्षय्यं ददत्यारण्यका हि नः ।!
विदूषक:-- तब तो आप पाथेय (मार्ग का भोजन इत्यादि) ग्रहण कीजिए (और प्रेम पथ के पथिक बन जाइए) । आपके द्वारा तपोवन क्रीडा-वाटिका कर दिया गया है - यह मैं देख रहा हूँ । राजा:- - मित्र, कुछ तपस्वियों के द्वारा मैं पहचान लिया गया हूँ । तो सोचो कि किस बहाने से फिर आश्रम में चला जाए ? विदूषक:-- आप (जैसे) राजाओं के लिये दूसरा क्या बहाना चाहिये । (आप जाकर इस प्रकार कहें कि तपस्वी लोग) हमें नीवार (जंगली धान) का छठा भाग (कर के रूप में) दें । राजा:-- मूर्ख, ये तपस्वी लोग दूसरी ही वस्तु कर के रूप में देते हैं, जो रत्नों की राशि (ढेर) को छोड़कर भी सहर्ष स्वीकार (अभिनन्दन) की जाती है । देखो राजाओं को (ब्राह्मणादि चारो) वर्णों से जो धन (कर के रूप में) प्राप्त होता है, वह नश्वर है (नष्ट हो जाता है) । (किन्तु) तपस्वी लोग हम लोगों को निश्चय ही तपस्या के छठे भाग को देते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होता ।
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