विदूषक:--
तब तो आप पाथेय (मार्ग का भोजन इत्यादि) ग्रहण कीजिए (और प्रेम पथ के पथिक बन जाइए) । आपके द्वारा तपोवन क्रीडा-वाटिका कर दिया गया है - यह मैं देख रहा हूँ ।
राजा:- -
मित्र, कुछ तपस्वियों के द्वारा मैं पहचान लिया गया हूँ । तो सोचो कि किस बहाने से फिर आश्रम में चला जाए ?
विदूषक:--
आप (जैसे) राजाओं के लिये दूसरा क्या बहाना चाहिये । (आप जाकर इस प्रकार कहें कि तपस्वी लोग) हमें नीवार (जंगली धान) का छठा भाग (कर के रूप में) दें ।
राजा:--
मूर्ख, ये तपस्वी लोग दूसरी ही वस्तु कर के रूप में देते हैं, जो रत्नों की राशि (ढेर) को छोड़कर भी सहर्ष स्वीकार (अभिनन्दन) की जाती है । देखो राजाओं को (ब्राह्मणादि चारो) वर्णों से जो धन (कर के रूप में) प्राप्त होता है, वह नश्वर है (नष्ट हो जाता है) । (किन्तु) तपस्वी लोग हम लोगों को निश्चय ही तपस्या के छठे भाग को देते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होता ।
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