द्वितीय:--
गोतम, ये वही इन्द्र के मित्र दुष्यन्त हैँ ?
प्रथमः--
ओर क्या ।
द्वितीयः--
इसी से तो नगर के द्वार की अर्गला के समान विशाल भुजाओं वाला यह (राजा दुष्यन्त) अकेला (ही) समुद्ररूप श्याम वर्ण की सीमावाली सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन करता है - यह आश्चर्य की बात नहीं है । क्योंकि राक्षसो के साथ बंधे (ठने) हुए वैर वाले (शत्रुता रखने वाले) देवता युद्धो मे इस (राजा दुष्यन्त) के चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा वाले धनुष और इन्द्र के वज्र पर विजय की आशा करते (रखते) हैं । अर्थात् युद्ध में इस राजा के धनुष तथा इन्द्र के वज्र की सहायता से ही अपनी विजय की अपेक्षा करते हैं ।
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