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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 17
राजा-- (सप्रणामम्‌) गच्छतां पुरो भवन्तौ । अहमप्यनुपदमागत एव । उभौ- विजयस्व । (इति निष्क्रान्तौ) । राजा-- माधव्य, अप्यस्ति शकुन्तलादश्नि कुतूहलम्‌ ? विदूषकः-- प्रथमं सपरिवाहमासीत्‌ । इदानीं राक्षसवृत्तान्तेन बिन्दुरपि नावशेषितः । राजा-- मा भैषीः । ननु मत्समीपे वर्तिष्यसे । विदूषकः- एष राक्षसाद्‌ रक्षितोऽस्मि । (प्रविश्य) दौवारिकः- सज्जो रथो भर्तुविजयप्रस्थानमपेक्चते । एष पुनर्नगराद्‌ देवीनामाज्ञप्िहरः करभक आगतः । राजा- (सादरम्‌) किमम्बाभिः प्रेषितः ? दौवारिकः-अथ किम्‌ ! राजा-- नन प्रवेश्यताम्‌ । दौवारिकः- तथा (इति निष्क्रम्य करभकेण सह प्रविश्य) एष भर्ता उपसर्प । करभकः- जयतु जयतु भर्ता । देव्याज्ञापयति । आगामिनि चतुर्थदिवसे प्रवृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति । तत्र दीरघायुषाऽ वश्यं सम्भवनीयेति । राजा-इतस्तपस्विकार्यम्‌ । इतो गुरुजनाज्ञा । द्वयमप्यनतिक्रमणीयम्‌ । किमत्र प्रतिविधेयम्‌ । विदूषकः- त्रिशङ्कुरिवान्तरा तिष्ठ । राजा-सत्यमाकुली भूतोऽस्मि । कत्ययोर्भिन्नदेशत्वाद्‌ दैधीभवति मे मनः । पुरः प्रतिहतं शैले स्रोतः स््रोतोवहो यथा ।।
राजा:-- (प्रणामपूर्वक) आप दोनों आगे-आगे चलें । मैं पीछे-पीछे आ ही रहा हूँ । दोनों:-- आप की विजय हो । (दोनों निकल जाते हैं) । राजा:-- माधव्य, क्या (तुझमे) शकुन्तला को देखने का (कौतूहल) है ? विदूषक:-- पहले (शकुन्तला को देखने की उत्सुकता की) बाढ़ सी आयी हुई थी । किन्तु अब राक्षसो के समाचार से बूँद भर (अर्थात्‌ थोड़ी) भी अवशिष्ट नहीं है । राजा:-- डरो मत । तुम मेरे समीप में रहोगे । विदूषक:-- तब तो मैं राक्षसों से सुरक्षित हो गया हूँ । द्वारपाल (प्रवेश कर):-- तैयार रथ महाराज के विजय-प्रस्थान की अपेक्षा (प्रतीक्षा) कर रहा है । परन्तु नगर से महारानी का सन्देशवाहक यह करभक आया हुआ है । राजा:-- (आदरपूर्वक) क्या माता जी के द्वारा भेजा गया है ? दवारपाल:-- ओर क्या । राजा:-- तो (उसे) प्रवेश कराओ। द्वारपाल:-- (जैसा आप कह रहे हैं) वैसा (करता हूँ) । (निकलकर पुनः करभक के साथ प्रवेश कर) ये महाराज हैं । (उनके) पास जाओ । करभक:-- जय हो, महाराज की जय हो । (पूज्य) महारानी आदेश दे रही हैं कि आगामी चौथे दिन मेरे उपवास की पारणा (उपवास की समाप्ति पर किया जाने वाला भोजन) होगी । उस अवसर पर चिरंजीवी (आप) के द्वारा (अपनी उपस्थिति से मुझे) अवश्य सम्मानित किया जाना चाहिये (अर्थात्‌ उस अवसर पर आप अवश्य आकर मुझे सम्मानित करें) । राजा:-- इधर तपस्वियों का कार्य है और उधर गुरुजनों की आज्ञा । दोनों ही अनुल्लङ्कनीय हैं । यहाँ (ऐसी स्थिति में) क्या (उपाय) करना चाहिये ? विदूषक:-- त्रिशंकु की भाँति मध्य में लटके रहिये । राजा:-- सचमुच में व्याकुल हो गया हूँ । दोनों कार्यों (यज्ञरक्षा और माता के उपवास-पारण में सममिलित होने) के भिन्नभित्र (अलग-अलग) स्थानों में होने के कारण मेरा मन सामने (स्थित) पर्वत में टकराने वाले नदी-प्रवाह की भाँति दुविधा में पड़ गया है (दो तरफ बंट गया है) ।
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