राजा:--
(प्रणामपूर्वक) आप दोनों आगे-आगे चलें । मैं पीछे-पीछे आ ही रहा हूँ ।
दोनों:--
आप की विजय हो । (दोनों निकल जाते हैं) ।
राजा:--
माधव्य, क्या (तुझमे) शकुन्तला को देखने का (कौतूहल) है ?
विदूषक:--
पहले (शकुन्तला को देखने की उत्सुकता की) बाढ़ सी आयी हुई थी । किन्तु अब राक्षसो के समाचार से बूँद भर (अर्थात् थोड़ी) भी अवशिष्ट नहीं है ।
राजा:--
डरो मत । तुम मेरे समीप में रहोगे ।
विदूषक:--
तब तो मैं राक्षसों से सुरक्षित हो गया हूँ ।
द्वारपाल (प्रवेश कर):--
तैयार रथ महाराज के विजय-प्रस्थान की अपेक्षा (प्रतीक्षा) कर रहा है । परन्तु नगर से महारानी का सन्देशवाहक यह करभक आया हुआ है ।
राजा:--
(आदरपूर्वक) क्या माता जी के द्वारा भेजा गया है ?
दवारपाल:--
ओर क्या ।
राजा:--
तो (उसे) प्रवेश कराओ।
द्वारपाल:--
(जैसा आप कह रहे हैं) वैसा (करता हूँ) । (निकलकर पुनः करभक के साथ प्रवेश कर) ये महाराज हैं । (उनके) पास जाओ ।
करभक:--
जय हो, महाराज की जय हो । (पूज्य) महारानी आदेश दे रही हैं कि आगामी चौथे दिन मेरे उपवास की पारणा (उपवास की समाप्ति पर किया जाने वाला भोजन) होगी । उस अवसर पर चिरंजीवी (आप) के द्वारा (अपनी उपस्थिति से मुझे) अवश्य सम्मानित किया जाना चाहिये (अर्थात् उस अवसर पर आप अवश्य आकर मुझे सम्मानित करें) ।
राजा:--
इधर तपस्वियों का कार्य है और उधर गुरुजनों की आज्ञा । दोनों ही अनुल्लङ्कनीय हैं । यहाँ (ऐसी स्थिति में) क्या (उपाय) करना चाहिये ?
विदूषक:--
त्रिशंकु की भाँति मध्य में लटके रहिये ।
राजा:--
सचमुच में व्याकुल हो गया हूँ । दोनों कार्यों (यज्ञरक्षा और माता के उपवास-पारण में सममिलित होने) के भिन्नभित्र (अलग-अलग) स्थानों में होने के कारण मेरा मन सामने (स्थित) पर्वत में टकराने वाले नदी-प्रवाह की भाँति दुविधा में पड़ गया है (दो तरफ बंट गया है) ।
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