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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 7
सेनापतिः- यत्‌ प्रभविष्णवे रोचते । राजा- तेन हि निवर्तय पूर्वगतान्‌ वनग्राहिणः । यथा न मे सैनिकास्त- पोवनमुपरुन्धन्ति तथा निषेद्धव्याः । पश्य-- शमप्रधानेषु तपोधनेषु गढ हि दाहात्मकमस्ति तेजः । स्यशनुकूला इव सूर्यकान्तास्तदन्यतेजोऽभिभवाद्वमन्ति । ।
सेनापति:-- जो महाराज को अच्छा लगे (वही होगा) । राजा:-- पहले (भेजे) गये हुए वन घेरने वालों को लोटा लो । जिस प्रकार मेरे सैनिक तपोवन में विघ्न न करें, वैसा उन्हे रोक दो (अर्थात्‌ सैनिकों को आदेश दे दो कि वे तपोवन में कोई विघ्न न पैदा करें) । देखो शान्तिप्रधान तपस्वियों में भस्म कर देने वाला गुप्त (छिपा ह॒आ) तेज रहता है, क्योंकि स्पर्श करने योग्य सूर्यकान्त मणियों के समान (वे तपस्वी) दूसरे के तेज से तिरस्कृत होने पर (अपने) उस (तेज) को प्रकट करते हैं ।
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