विदूषकः-- यद्यव, प्रत्यादेश इदानीं रूपवतीनाम् ।
राजा- इदं च मे मनसि वर्तते--
आनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै रनाविद्धं रलं मधु नवमनास्वादितरसम् । अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं न॒ जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः ।।
विदूषक:--
यदि ऐसा है (तो) अब सभी रूपवती स्त्रीयों की निराकृति है अर्थात् शकुन्तला से (उसके लावण्य के कारण) सभी सुन्दरियां तिरस्कृत हो गयीं ।
राजा:--
और मेरे मन में यह आता है कि उस (शकुन्तला) का निष्कलंक सौन्दर्य (रूप) (किसी के भी द्वारा) न सूंघा गया फूल है, नखुनो से अछिन्न नवपल्लव है, न बिंधा हुआ (अक्षत) रत्न है, जिसके रस को नहीं चखा गया है ऐसा नया (ताजा) मधु है और पुण्य के (अक्षत सम्पूर्ण) फल के समान है । विधाता यहाँ किस भोक्ता को उपस्थित करेगा (अर्थात् किसको उसका उपभोक्ता बनायेगा) मैं (यह) नहीं जान पा रहा हूँ ।
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