मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 10
विदूषकः-- यद्यव, प्रत्यादेश इदानीं रूपवतीनाम्‌ । राजा- इदं च मे मनसि वर्तते-- आनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै रनाविद्धं रलं मधु नवमनास्वादितरसम्‌ । अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं न॒ जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः ।।
विदूषक:-- यदि ऐसा है (तो) अब सभी रूपवती स्त्रीयों की निराकृति है अर्थात्‌ शकुन्तला से (उसके लावण्य के कारण) सभी सुन्दरियां तिरस्कृत हो गयीं । राजा:-- और मेरे मन में यह आता है कि उस (शकुन्तला) का निष्कलंक सौन्दर्य (रूप) (किसी के भी द्वारा) न सूंघा गया फूल है, नखुनो से अछिन्न नवपल्लव है, न बिंधा हुआ (अक्षत) रत्न है, जिसके रस को नहीं चखा गया है ऐसा नया (ताजा) मधु है और पुण्य के (अक्षत सम्पूर्ण) फल के समान है । विधाता यहाँ किस भोक्ता को उपस्थित करेगा (अर्थात्‌ किसको उसका उपभोक्ता बनायेगा) मैं (यह) नहीं जान पा रहा हूँ ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें