सेनापति—
महाराज जो आज्ञा देते हैं (कार्य उसी के अनुसार होगा)।
विदूषक—
तुम्हारी (मृगया के प्रति) उत्साह की बातें नष्ट हों। (सेनापति निकल जाता है)।
राजा:--
(सेवक-वर्ग को देखकर) आप लोग मृगया (शिकार खेलने) के वेष को उतार दें।
रैवतक, तुम भी अपने काम (नियोग) को पूरा (अशन्य) करो।
सेवकवर्ग—
स्वामी जो आज्ञा देते हैं (स्वामी की जो आज्ञा)। (निकल जाते हैं)विदूषक—
आपने (इस स्थान को) मक्षिकाशून्य (एकान्त) बना दिया।
अब आप वृक्ष की छाया से निर्मित वितान से युक्त इस शिला-खण्ड पर बैठें, जिससे मैं भी सुखपूर्वक बैठ जाऊँ।
राजा—
आगे चलो ।
विदूषक:--
आप आईये (दोनो घूमकर बैठ जाते हैं) ।
राजा
माधव्य, तुमने नेत्रों का फल नहीं पाया, क्योकि तुमने देखने योग्य वस्तु नहीं देखी ।
विदूषक(नेत्रों का फल) क्यों नहीं (पाया)?
आप तो मेरे सामने (ही) हैं।
राजा—
सभी लोग अपने व्यक्ति को सुन्दर समझते हैं।
मैं तो आश्रम की अलङ्कारभूत उस शकुन्तला को लक्ष्य करके कह रहा हूँ।
विदूषक—
(अपने मन में) अच्छा, (मैं) इनको अवसर नही दूंगा।
(प्रकट रूप में) हे मित्र, तुम तपस्वी की कन्या के इच्छुक दिखायी दे रहे हो।
राजा—
हे मित्र, परित्याज्य वस्तु पर पुरुवंशियो का मन प्रवृत नहीं होता है।
शिथिल (होने के कारण) मन्दार (वृक्ष) के ऊपर गिरे हुये चमेली के पुष्प की भाँति वह मुनि की सन्तान (शकुन्तला) निश्चय ही अप्सरा (मेनका) की पुत्री है (और मेनका द्वारा) छोड़ी जाने पर (मुनि कण्व को) प्राप्त हुई है।
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