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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 8
सेनापतिः-- यदाज्ञापयति स्वामी । विदूषकः-- ध्वंसतां त उत्साहवृत्तान्तः । (धंसदु दे उच्छाहवुत्तन्तो ।) (निष्क्रान्तः सेनापतिः) । राजा-- (परिजनं विलोक्य) अपनयन्तु भवत्यो मृगयावेशम्‌ । रैवतक, त्वमपि स्वनियोगमशुन्य कुरु । परिजनः-- यद्‌ देव आज्ञापयति । (जं देवो आणवेदि ।) (इति निष्क्रान्तः) । विदूषकः-- कृत भवता निर्मक्षिकम्‌ । साम्प्रतमेतस्मिन्‌ पादपच्छाया विरचितवितानसनाथे शिलातले निषीदतु भवान्‌ , यावदहमपि सुखासीनो भवामि । राजा-- गच्छाग्रतः । विदूषकः--एतु भवान्‌ । (इत्युभौ परिक्रम्योपविष्टो) राजा- माधव्य, अनवाप्तचक्षुःफलोऽसि । येन त्वया दर्शनीयं न दृष्टम्‌ । विदूषकः- ननु भवानग्रतो मे वर्तते । (णं भवं अग्गदो मे वद्दि ।) राजा- सर्वः कान्तमात्मीयं पश्यति । अहं तु तामाश्रमललामभूतां शकुन्तलामधिकृत्य व्रवीमि । विदूषकः- (स्वगतम्‌) भवतु । अस्यावसरं च दास्ये । (प्रकाशम्‌) भो वस्व, ते तापसकन्वकाऽ भ्यर्थनीया दृश्यते । राजा-- सखे, न परिहार्ये वस्तुनि पौरवाणां मनः प्रवर्तते । सरयुवतिसम्भवं किल, मुनेरपत्यं तदुज्ज्िताधिगतम्‌ । अर्कस्योपरि शिथिलं च्युतमिव नवमालिकाकुसुमम्‌ ।।
सेनापति— महाराज जो आज्ञा देते हैं (कार्य उसी के अनुसार होगा)विदूषक— तुम्हारी (मृगया के प्रति) उत्साह की बातें नष्ट हों। (सेनापति निकल जाता है)। राजा:-- (सेवक-वर्ग को देखकर) आप लोग मृगया (शिकार खेलने) के वेष को उतार दें। रैवतक, तुम भी अपने काम (नियोग) को पूरा (अशन्य) करो। सेवकवर्ग— स्वामी जो आज्ञा देते हैं (स्वामी की जो आज्ञा)(निकल जाते हैं) विदूषक— आपने (इस स्थान को) मक्षिकाशून्य (एकान्त) बना दिया। अब आप वृक्ष की छाया से निर्मित वितान से युक्त इस शिला-खण्ड पर बैठें, जिससे मैं भी सुखपूर्वक बैठ जाऊँ। राजा— आगे चलो । विदूषक:-- आप आईये (दोनो घूमकर बैठ जाते हैं)राजा माधव्य, तुमने नेत्रों का फल नहीं पाया, क्योकि तुमने देखने योग्य वस्तु नहीं देखी । विदूषक (नेत्रों का फल) क्यों नहीं (पाया)? आप तो मेरे सामने (ही) हैं। राजा— सभी लोग अपने व्यक्ति को सुन्दर समझते हैं। मैं तो आश्रम की अलङ्कारभूत उस शकुन्तला को लक्ष्य करके कह रहा हूँ। विदूषक(अपने मन में) अच्छा, (मैं) इनको अवसर नही दूंगा। (प्रकट रूप में) हे मित्र, तुम तपस्वी की कन्या के इच्छुक दिखायी दे रहे हो। राजा— हे मित्र, परित्याज्य वस्तु पर पुरुवंशियो का मन प्रवृत नहीं होता है। शिथिल (होने के कारण) मन्दार (वृक्ष) के ऊपर गिरे हुये चमेली के पुष्प की भाँति वह मुनि की सन्तान (शकुन्तला) निश्चय ही अप्सरा (मेनका) की पुत्री है (और मेनका द्वारा) छोड़ी जाने पर (मुनि कण्व को) प्राप्त हुई है।
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