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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 5
(उपेत्य) जयतु जयतु स्वामी । गृहीतश्चापदमरण्यम्‌ । किमन्यत्रावस्थीयते ? राजा-- मन्दोत्साहः कृतोऽस्मि मृगयापवादिना माधव्येन । सेनापतिः-(जनातिकम्‌) सखे, स्थिर प्रलिगन्धो भव अहं तावत्‌ स्वामिनश्चित्तवृत्तिमनुवर्तिष्ये । (प्रकाशम्‌) प्रलपत्वेष वैधेयः । ननु प्रभुरेव निदनम्‌ । मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः सत्त्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः । उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग्‌ विनोदः कुतः ।।
(समीप जाकर) जय हो, महाराज की जय हो, जय हो । हिंसक पशुओं (का आवास) जंगल घेर लिया गया है । (अभी तक) आप अन्यत्र (वन से दूर) क्यो ठहरे (रुके) हैं ? राजा:-- मृगया (शिकार खेलने) की निन्दा करने वाते माधव्य के द्वारा (मृगया के प्रति मेरा) उत्साह मन्द कर दिया गया है । सेनापति:-- (हाथ की ओट में) हे मित्र, दृढ़ आग्रह (प्रतिबन्ध) वाले होओ (अर्थात्‌ अपने आग्रह पर अड़े रहना) । तब तक की महाराज की इच्छा (चित्तवृति) का अनुसरण करता हूँ । (प्रकट रूप से) यह मूर्ख (वैधेय) बका करे । (इस विषय में) तो स्वामी ही प्रमाण (निदर्शन) हैं । (शिकार खेलने से) चर्बी कम हो जाने के कारण पतले उदर वाला शरीर चुस्त और अध्यवसाय (परिश्रम) करने के योग्य हो जाता है । प्राणियों (जीवो) के भय और क्रोध की (स्थिति) में (उनके) विकृत (क्षुब्ध) मन का भी ज्ञान हो जाता है। धनुर्धारियों (धनुर्धारी योद्धाओं) के लिये यह गौरव का विषय है कि चलते-फिरते लक्ष्य पर (भी उनके) बाण सफल हो जाते हैं । लोग मृगया (शिकार) को व्यर्थ में ही व्यसन (दुर्गुण) कहते हैं । इस प्रकार का मनोरंजन (अन्यत्र) कहाँ (हो सकता है ) ?
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