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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 9
विदूषकः- (विहस्य) यथा कस्यापि पिण्डखजरिरुद्वेजितस्य तिन्तिण्यामभिलाषो भवेत्‌ तथा स्त्रीरलपरिभोगिणो भवत इयमभ्यर्थना । राजा--न तावदेनां पश्यसि येनैवमवादीः । विदूषकः- तत्‌ खलु रमणीयं यद्‌ भवतोऽपि विस्मयमुत्पादयति । राजा-- वयस्य, किबहुना-- चित्रे निवेश्य परिकल्यितसत्वयोगा रूपोच्चयेन मनसा विधिना कृता नु। खीरत्नसुष्टिरपरा प्रतिभाति सा मे धातुर्विभुत्वमनुचिन्त्य वपुश्च तस्याः ।।
विदूषक:-- (हंसकर) जिस प्रकार पिण्ड खजूर (उत्तम कोटि के खजूर खाने) से ऊबे हुए किसी व्यक्ति की इमली (तिन्तिणी) के खाने में इच्छा होती है, उसी प्रकार स्री-रत्नों का उपभोग करने वाले आपकी यह इच्छा है । राजा:-- अभी तुमने इस (शकुन्तला) को देखा नहीं है, जिससे ऐसा कह रहे हो । विदूषक:-- निश्चय ही वह रमणीय होगी जो आप को भी आश्चर्ययुक्त कर रही है । राजा:-- मित्र, अधिक (कहने) से क्या ? विधाता (ब्रह्म) की सृष्टिशक्ति (निर्माण-सामर्थ्य) और उस (शकुन्तला) के शरीर को विचार करके मुझे वह (शकुन्तला) विधाता के द्वारा चित्र में बनाकर (तब उसमे) प्राणों का सञ्चार कर (जीवन डालकर) मानो मन के द्वारा सोन्दर्य-समूह से निर्मित (बनायी गयी) विलक्षण (अद्वितीय) स्रीरत्न की रचना प्रतीत होती है ।
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