विदूषक:--
(हंसकर) जिस प्रकार पिण्ड खजूर (उत्तम कोटि के खजूर खाने) से ऊबे हुए किसी व्यक्ति की इमली (तिन्तिणी) के खाने में इच्छा होती है, उसी प्रकार स्री-रत्नों का उपभोग करने वाले आपकी यह इच्छा है ।
राजा:--
अभी तुमने इस (शकुन्तला) को देखा नहीं है, जिससे ऐसा कह रहे हो ।
विदूषक:--
निश्चय ही वह रमणीय होगी जो आप को भी आश्चर्ययुक्त कर रही है ।
राजा:--
मित्र, अधिक (कहने) से क्या ? विधाता (ब्रह्म) की सृष्टिशक्ति (निर्माण-सामर्थ्य) और उस (शकुन्तला) के शरीर को विचार करके मुझे वह (शकुन्तला) विधाता के द्वारा चित्र में बनाकर (तब उसमे) प्राणों का सञ्चार कर (जीवन डालकर) मानो मन के द्वारा सोन्दर्य-समूह से निर्मित (बनायी गयी) विलक्षण (अद्वितीय) स्रीरत्न की रचना प्रतीत होती है ।
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