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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 14
(नेपथ्ये) हन्त, सिद्धार्थौ स्वः । राजा- (कर्ण दत्वा) अये, धीरप्रशान्तस्वरैस्तपस्विभिर्भवितव्यम्‌ । (प्रविश्य) दौवारिकः- जयतु जयतु भर्ता । एतौ द्वौ ऋषिकुमारौ प्रतीहार भूमिमुपस्थितौ । राजा- तेन ह्यविलम्बितं प्रवेशय तौ । दौवारिकः-एष प्रवेशयामि । (इति निष्क्रम्य, ऋषिकुमाराभ्यां सह प्रविश्य) इत इतो भवन्तौ । (उभौ राजानं विलोकयतः) प्रथमः-- अहो, दीप्तिमतोऽपि विश्वसनीयताऽस्य वपुषः । अथवेपपन्नमेतदस्मिन्‌ ऋषिभ्यो नातिभिन्ने राजनि । कुतः-- अध्याक्रान्ता वसतिरमुनाऽप्याश्रमे सर्वभोग्ये रक्षायोगादयमपि तपः प्रत्यहं सञ्चिनोति। अस्यापि द्यां स्पृशति वशिनश्चारणद्रन्दगीतः पुण्यः शब्दो मुनिरिति मुहुः केवलं राजपुर्वः ।।
(नेपथ्य में) ओह, हम कृतार्थ हो गये । राजा:-- (कान लगाकर) अरे, गम्भीर और शान्त स्वर वाले तपस्वियों को होना चाहिये (अर्थात्‌ गम्भीर और शान्त स्वर से ज्ञात होता है कि ये तपस्वी हैं) । द्वारपाल (प्रवेश करके):-- जय हो, महाराज की जय हो । ये दो ऋषिकुमार द्वार पर उपस्थित हैं । राजा:-- तो अविलम्ब उनको प्रवेश कराओ । द्वारपाल:-- अभी प्रवेश कराता हूँ । (निकलकर और ऋषिकुमारों के साथ प्रवेश करके) इधर से, इधर से आप लोग (आवें) । (दोनों राजा को देखते हैं) । प्रथम:-- अहो, इसके (राजा के) कान्तिमान (तेजस्वी) शरीर की विश्वसनीयता! अर्थात्‌ तेजस्वी होने पर भी इसका शरीर विश्वास उत्पन्न कर रहा है । अथवा ऋषियों के तुल्य इस राजा के विषय में यह उचित है । क्योकि इन (राजा) के द्वारा भी सभी के द्वारा आश्रयणीय (गृहस्थ) आश्रम में निवास स्वीकार किया गया है । (प्रजा की) रक्षा करने से यह (राजा) भी प्रतिदिन तपस्या का सञ्चय करता है । जितेन्द्रिय इस (राजा) का भी केवल राजपूर्वक (अर्थात्‌ राज शब्द पूर्व में है जिसके ऐसा) पवित्र ऋषि (राजर्षि) - यह शब्द चारणयुगल के द्वारा गाया जाता हुआ बार-बार स्वर्ग का स्पर्शं करता है अर्थात्‌ स्वर्ग में व्याप्त हो जाता है ।
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