(नेपथ्य में) ओह, हम कृतार्थ हो गये ।
राजा—
(कान लगाकर) अरे, गम्भीर और शान्त स्वर वाले तपस्वियों को होना चाहिये (अर्थात् गम्भीर और शान्त स्वर से ज्ञात होता है कि ये तपस्वी हैं)।
द्वारपाल(प्रवेश करके)—
जय हो, महाराज की जय हो। ये दो ऋषिकुमार द्वार पर उपस्थित हैं।
राजा—
तो अविलम्ब उनको प्रवेश कराओ।
द्वारपाल—
अभी प्रवेश कराता हूँ। (निकलकर और ऋषिकुमारों के साथ प्रवेश करके) इधर से, इधर से आप लोग (आवें)।
(दोनों राजा को देखते हैं)प्रथम—
अहो, इसके (राजा के) कान्तिमान (तेजस्वी) शरीर की विश्वसनीयता! अर्थात् तेजस्वी होने पर भी इसका शरीर विश्वास उत्पन्न कर रहा है ।
अथवा ऋषियों के तुल्य इस राजा के विषय में यह उचित है।
क्योकि इन (राजा) के द्वारा भी सभी के द्वारा आश्रयणीय (गृहस्थ) आश्रम में निवास स्वीकार किया गया है।
(प्रजा की) रक्षा करने से यह (राजा) भी प्रतिदिन तपस्या का सञ्चय करता है।
जितेन्द्रिय इस (राजा) का भी केवल राजपूर्वक (अर्थात् राज शब्द पूर्व में है जिसके ऐसा) पवित्र ऋषि (राजर्षि)— यह शब्द चारणयुगल के द्वारा गाया जाता हुआ बार-बार स्वर्ग का स्पर्शं करता है अर्थात् स्वर्ग में व्याप्त हो जाता है।
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