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अध्याय 8 — अष्टम अध्याय
शिवभारतम्
73 श्लोक • केवल अनुवाद
पंडित बोलें - परमानंद शिवाजी राजा ने शिवनेरी किले पर जन्म लिया, इस प्रकार जो हमने बोला था उस पर हमें संशय हैं।
क्योंकि वह किला निजामशाह का हितकारी, यशस्वी एवं मजबूत था। मानो कि वह दूसरे धारागिरी (दौलताबाद) के रूप में लोक में विख्यात हो।
जैसी ही वहां पर शाहजीराजे का आगमन होता है वैसे ही हम सभी भाट गोविंद नन्दन कहने लगे।
कवींद्र बोलें - अरे द्विजश्रेष्तों! यह अमृत के समान अत्यंत मधुर एवं पवित्र इस शहाजीराजे की कथा का श्रवण करो।
सूर्य की तरह प्रतापी बर्बर मणिकंबर के अस्त हो जाने पर निजामशाह को दूसरे अच्छे मंत्री के न मिलने से उसके राज्य की स्थिति में संशय उत्पन्न हो गया।
भाग्यवश अनुभवी इब्राहिम आदिलशाह के दिवंगत हो जाने पर उसके उनमुक्त बेटे महमूद ने उसकी राजगद्दी संभाली।
शाहजहां यह दिल्ली का बादशाह बन गया और उसकी सेना दक्षिण जीतने के लिए बड़े अभिमान के साथ आई।
ऐसे समय पर अपना पुराना संबंध पहचानकर निजामशाह की कल्याण करने की इच्छा से महाबलशाली शहाजीराजे बीजापुर छोड़कर उसके पास गये।
बाद में यादवराज भी मुगलों की अधीनता को छोडकर दौलताबाद में निजामशाह के पक्ष में आकर मिल गया।
इस बीच में विश्वासराज कुल वंशज सिद्धपाल के बेटे शिवभक्त, महावती,
सुप्रसिद्ध एवं अत्यत वैभवशाली विजयराज से निजामशाह के अत्यंत विश्वासपात्र थे और वे शिवनेरी किले पर रहते थे।
उनको अपनी जयंती नाम की पुत्री शहाजीराजे के पुत्र संभाजी के लिए अनुरूप प्रतीत हुई।
शहाजीराजे को भी वह संबंध पृथ्वी पर अत्यंत प्रशंसनीय लगा और उसने अपने पुत्र के लिए बहु रूप में जयंती की मांग की।
बाद में विजयराज और शहाजीराजे इन दोनों के संबंध को सुस्थापित करने के लिए महोत्सव हुआ।
विश्वासराज कुल वंशजों के अत्यंत तेजस्वी राजाओं की और भोंसले वंशजों की बड़ी बारात इकट्ठी हुई।
जयंती और संभाजी इन प्रशंसनीय गुणयुक्त जोड़ी का विवाह कार्यक्रम शिवनेरी किले पर बड़े आनंद के साथ संपूर्ण हुआ।
उस महोत्सव की समाप्ति के कुछ दिनों बाद उसके संबंधियों की अनुमति से
अपनी गर्भवती पत्नी को अपने सगे-संबंधियों के साथ उस किले पर छोड़कर शहाजीराजे दर्याखान को जीतने के लिए निकल गये।
शिवनेरी किले पर शहाजीराजे का आगमन किस प्रकार हुआ यह मैंने बता दिया है और क्या आप सुनना चाहते हैं?
पंडित बोलें - दिल्ली के बादशाह को अचानक छोड़कर निजामशाह के पक्ष में महाव्रती, एवं महाबलशाली महाराजा यादवराज आकर मिल गये और
पराक्रमी मुगलों के साथ युद्ध करने के लिए तैयार हो गए किन्तु ऐसी स्थिति में अपने अभीष्ट के इच्छुक निजामशाह ने क्या किया?
कवींद्र बोलें - भाग्यवश विषयों में आसक्त हुए निजामशाह की बुद्धि को दुष्ट मंत्रियों ने मिलकर घूमा दिया।
उस उनमुक्त बादशाह को सज्जन दुर्जन की तरह प्रतीत होने लगे एवं प्रियवादी आयंत दुष्ट पुरुष भी सज्जन प्रतीत होने लगे।
उसको विपरीत बुद्धि युक्त गुरुजन भी तुच्छ प्रतीत होने लगे और सलाहकारी गुरुजनों के प्रति उसकी आदर बुद्धि नष्ट हो गई।
अव्यवस्थित मन से युक्त एवं प्रतिदिन दारू पीने से उनमुक्त होकर निंदनीय भाषण करने वाले उस निजामशाह का राज्य नष्ट हो रहा था।
ऐसी स्थिति में एक बार अत्यंत तेजस्वी यादवराज उसको नमस्कार करने के लिए आया तो उस दुर्बुद्धि निजामशाह ने उसका अपमान कर दिया।
निजामशाह से इस प्रकार का अपमान हो जाने से उस महामना एवं अभिमानी यादवराज को बहुत दुःख प्राप्त हुआ।
हमीदादि दुष्ट सेनापतियों को निजामशाह ने यह योजना पहले ही बता दी थी।
फिर उन्होंने मदमस्त हाथी की तरह दुःख की पीड़ा से वापस जाते हुए यादवराज को सभागृह के द्वार पर ही घेर लिया।
वह अपने पुत्र, अमात्य, बांधयों एवं अनेक अन्य लोगों के साथ लड़ते लड़ते स्वर्गलोक चला गया।
मेरू पर्वत का उल्टा हो जाना या सूर्य का नीचे गिर जाना या यमराज का अंत हो जाना या फिर वरुणदेव का जल जाना जैसा अहितकर है
वैसे ही वहां पर यादवराज की मृत्यु का होना सातों लोकों के लिए अत्यंत अहितकर है।
अपने ससुर यादवराज की उस अवस्था को सुनकर यशस्वी शहाजीराजे ने निजामशाह की सहायता करना छोड़ दिया।
फिर तापी नदी के तट से जल्द ही मुगलों की सेना वहां आई और निजामशाह की दौलताबाद राजधानी को चारों ओर से घेर लिया।
उसी समय अभिमानी एवं लोभी आदिलशाह ने अपनी सेना को इकड्डा करके दौलताबाद की ओर भेज दिया।
दौलताबाद पर अधिकार करने की इच्छा से शाहजहां एवं महमूद आदिलशाह की सेनाओं में परस्पर प्रतिदिन युद्ध होने लगा।
स्वयं निजामशाह भी दौलताबाद किले के माथे पर स्थित होकर उन दोनों सेनाओं के साथ लड़ने लगा।
उसके बाद अत्यंत बलशाली मुगलों की सेना से और महमूद आदिलशाह की सेना से निजामशाह तभी पराजित हो गया था।
तब वह निजामशाह विविध सेनाओं, मूर्ख मंत्री फतेहखान,
संपूर्ण परिजन, विशाल खजाना एवं किले के साथ मुगलों की सेना रूपी समुद्र में डूब गया।
पंडित बोले - जिसके पास अस्सी हजार गतिमान घोड़े, चौरासी गिरीदुर्ग एवं जिसके पास अनेक स्थलदुर्ग एवं जलदुर्ग थे,
जिसके अधीन समृद्ध एवं शत्रुओं के लिए अजेय देश था,
जिसने आदिलशाह की और अभिमानी दिल्लीपति की सेना को पग-पग पर पराजित किया था,
बाज के आकस्मिक झड़प के समान जिसके आकस्मिक छापों से शत्रु रूपी पक्षी छिपकर बैठते थे
ऐसे उस निजामशाह का नाश किस कारण से हुआ, हे कवींद्र उस कारण को सुनने की हमारी इच्छा है उसको आप बताइए।
कवींद्र बोलें - सभी का पालन करने वाले पिता मलिकंबर की मृत्यु हो जाने पर उसका क्षुद्र बुद्धि फत्तेखान को भाग्यवश निजामशाह का अमात्य पद मिल गया और
वह इस प्रकार क्रूर एवं प्रतापी फत्तेखान, यमराज की तरह जनता को पीड़ा देने लगा।
फ़तेखान एवं दुष्ट हमीदखान की सलाह से जब निजामशाह ने यादवराज को मरवा दिया
तब से शहाजी आदि सभी राजा एवं मुगल सरदार उससे नाराज हो गये।
विश्वास उड़ जाने से, क्रोध से एवं भय के कारण से कुछ राजा आदिलशाह से जाकर मिल गये, कुछ ने दिल्ली के बादशाह का आश्रय लिया और
क्रूर मन वाले कुछ लोगों ने उसका विरोध किया एवं कुछ लोगों ने उसके प्रति तटस्थता दिखाई।
उस दुराचारी दुष्ट निजामशाह के इस प्रकार के अनेक दुष्कर्मों के कारण भयंकर अवर्षण होने से प्राणियों का अनिष्ट होने लगा।
बहुत समय तक उसके देश में बारिश न होने के कारण से धान्य अत्यधिक मंहगा हो गया एवं सोना सस्ता हो गया था।
धनाढ्य लोग प्रस्थमात्र रत्नों को देकर बड़े प्रयत्न से प्रस्थमात्र कुलत्थी प्राप्त करते थे।
खाने को कुछ न मिलने के कारण आकस्मिक हाहाकार मच गया और परस्पर पशु पशुओं को एवं मनुष्य मनुष्यों को खाने लगे।
उस भयंकर अकाल के कारण से तथा परचक्र के आगमन से और अनुभवी पुराने सेनापतियों एवं विपुल सेना के अभाव के कारण से
प्रत्येक क्षण क्षीणता को प्राप्त होता हुआ निजामशाह और उसके साथ दुष्ट फत्तेखान बलवान मुगलों के हाथ पकड़े गए।
यदि समय अनुकूल हो तो सब अनुकूल ही होगा और जब वही प्रतिकूल हो तो सब कुछ प्रतिकूल होगा।
जिस मनुष्य का यह सनातन भगवान काल अनुकूल होता है उसके सभी कार्य अनायास ही सिद्ध हो जाते हैं।
उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि, परिपक्वता, क्षय और नाश - ये काल निर्मित छह अवस्था हैं।
विजय या पराजय, शत्रुत्व, मंत्री बल या उसका अभाव, विद्वत्ता या अविद्वता, दानशीलता या कृपणता,
प्रवृत्ति या निवृत्ति, स्वतंत्रता या परतंत्रता, समृद्धि या निर्धनता ये सब काल की विपरितता एवं अनुकूलता से उत्पन्न होते हैं।
जन्म, आयु और मृत्यु ये तीनों अवस्थाएं एवं यज्ञादिक क्रियाएं काल के कारण ही उत्पन्न होती है।
काल के बिना बीज नहीं होता है, काल के बिना अंकुर नहीं होता है, काल के बिना फूल नहीं होता है, काल के बिना फल नहीं होता है,
काल के बिना तीर्थ नहीं होता है, काल के बिना तपस्या नहीं होती है, काल के बिना सिद्धि नहीं प्राप्त होती, काल के बिना विजय प्राप्त नहीं होती है,
काल के बिना अग्नि चंद्र एवं सूर्य चमकते नहीं है, काल के 'बिना समुद्र ज्वारभाटे को भी प्राप्त नहीं होता है,
काल के बिना भागीरथी गंगा को नहीं ला सकते, नृगराजा काल के बिना छिपकली की योनि से मुक्त नहीं हो सकते थे,
काल के बिना राम रावण को नहीं मार सकते थे, काल के बिना बिभीषण को लंका प्राप्त नहीं हो सकती थी,
काल के बिना श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठा नहीं सकते थे, काल के बिना अर्जुन कर्ण को मार नहीं सकते थे,
सुख एवं दुःख का कारण काल ही है इसलिए उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय करने वाले काल को ही मैं भगवान समझता हूं।
युद्ध में पराजित होने से निजामशाह का नाश हो गया, दैवगरि को प्राप्त करके राक्षस रूपी दिल्ली का बादशाह आनंदित हुआ और
अपनी सेना के पराजित होने से आदिलशाह लज्जित हो गया, ये सब काल के प्रभाव से हुआ ऐसा तुम द्विजश्रेष्ठों! समझो।
देवगिरी के उग्र किले को मुगलों ने घेरकर निजामशाह को पकड़ लिया तब आदिलशाह की सेना हतबल होकर वहां से वापस लौट गई।
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धर्म का अन्वेषण
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