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अध्याय 7 — सप्तम् अध्याय
शिवभारतम्
37 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोला - उस बाल रूप में खेलने वाले उस सुंदर एवं अनुपम लीलाओं से युक्त बालक, यह अमानुषिक विष्णु है, यह उस माता-पिता को समझ नहीं आया।
पृथ्वी के भार को कम करने के लिए भू-तल पर अवतरित होकर शहाजीराजे के घर में बालरूप में विहार करने वाला और
अपनी शोभा से जन्मदात्री मां एवं अन्य लोगों का मनोरंजन करने वाला वह सर्वात्मा विष्णु वहां अनेक प्रकार की लीलाएं करने लगा।
इंद्र के इच्छित कार्य को करने के लिए प्रत्येक युद्ध में राक्षसों को अनेक बार मार करके शस्त्र उठाया हुआ
वह विष्णु मानो थककर क्षीरसागर में सो रहा है, ऐसा वह मां का दूध पीने के लिए रो रहा था।
बाललीला करने वाला वह बालक मरकतमणि युक्त भूमि पर रेंगते समय उस पर पड़े हुए अपने प्रतिबिंब को देखकर बल से उसको पकड़ने लगा।
वह घुटने से रेंगते समय उसके पद कमल रूपी तलवे की लालीमा की चमक से प्रांगण में स्थित स्फटिकमणि माणिक जैसी दिख रही थी।
धूल से धूसरित शरीर वाला वह घर के आंगन में रेंगते हुए, पैरों के मणि जड़ित नुपूरों की छुमछुम आवाज से मात्ता को मनोरंजित कर रहा था।
रत्नमय प्रागंण में खेलते समय जल्द रेंगने वाला वह बालक अपने प्रतिबिंब से पग-पग पर प्रतिस्पर्धा कर रहा था।
अहो! जिसकी कृपा से सभी देवों ने अमृत पान किया, ऐसा वह स्वयं कोमल मिट्टी खा करके आनंदित हो तो इसमें क्या आश्चर्य है?
जिसने बलि के साथ छल करके तीनों लोकों को तीन पगों में लांग दिया, अहो! ऐसे उस देव को अपने घर की देहली को लांघने के लिए प्रयत्न करना पड़ रहा है।
जो प्रभु स्वयं सातों लोकों का आधार है, अहो! फिर भी वह दाई के उंगलियों को पकड़कर उठता था।
स्फटिकमणि से युक्त दीवार पर पड़े हुए सूर्य के प्रतिबिंब को देखकर, वह तर्जनी उंगली से मां को दिखाकर
"तू अपने हाथ से लाकर मुझे दे" ऐसा कहकर वह रोने लगा और अपने इस पागलपन से मां को पागल की तरह हंसाने लगा।
जिनको अभी नवीन दांत निकल रहें हैं ऐसे हाथी के बच्चों का मस्तक अपने शुंड से उड़ाई हुई धूल से जैसे धूसरित हो जाता है वैसे ही कुंद की कलियों जैसे शोभायमान नवीन दांत जिसके अभी निकल रहें हैं और
अपने हाथों से धूल को उड़ाकर घर के दरवाजे के आगे खेलते हुए बालक को अनुशासित करने आई हुई धाइयां, उसको देखकर स्तब्ध हो गई।
दाइयों की तालियों से कुतूहल को प्राप्त हुआ वह प्रसन्नवदन बालक अनेक प्रकार से नृत्य करने लगा।
जिसने विधाता को लक्षणों सहित चारों वेदों को पढ़ाया था वह भी स्वयं दाईयों के मुंह से भिन्न भिन्न नामों को पढ़ने लगा।
सभी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला वह विष्णु अपने शरीर पर पहने हुए आभूषणों को शीघ्र उतार उतारकर दाइयों को देता था।
पिता के मदमस्त हाथी एवं घोड़ों को पसंद नापसंद करने में वह स्वयं स्वामी होने के कारण उनका अनादर करके वह मिट्टी के हाथी एवं घोड़ों को पसंद करता था।
शिखा से शोभायमान वह बालक मोरों के पंखों को लेने की इच्छा से मोरों के बच्चों के पीछे दौड़ रहा था।
मोर, तोता और कोयल इनके आवाज की तरह आवाज का अनुकरण करने से ऐसा प्रतीत होता था कि साक्षात् वह पक्षी ही आवाज कर रहा हो।
वह समीपवर्ती बालक एकदम बाघ जैसी गरजना करके अपने से स्नेह करने वाली दाइयों को भी डराता था।
वह भ्रम रहित होते हुए भी कभी भौर के समान भ्रांत होकर घूमता था, प्रसन्नचित्त होने पर वह कभी घोड़े की तरह जोर से हंसता था।
कभी हाथी के उच्च चीत्कार के समान जोर से चीत्कार करता था।
अपने गंभीर एवं मधुर स्वर से आकाश और पृथ्वी को ध्वनि युक्त करता हुआ वह कभी अभिमान से दुंदुभी जैसी आवाज करता था।
कभी वह अन्य बच्चों से मिट्टी के ऊंचे टीले बनवाकर कहता था कि "यह मेरे किले हैं"।
कभी लुकाछिपी का खेल खेलते समय वह घर के कोने में छिपकर बैठ जाता तो उसके मित्र उसको ढूंढकर जब स्पर्श करते थे तो वह हंसता था।
कभी कभी, हाथ से छूटी हुई गेंद बार बार उछलती है तो उसको पुनः नीचे गिराने के लिए वह हाथ से मारता था।
कभी, कृष्णसार की तरह आंखों वाला वह स्वयं उच्च फेंकी हुई गेंद को, आकाश से नीचे आते समय ऊपर मुंह करके
ऐसे ध्यानपूर्वक देखता था कि मानो भूमि पर हाथों को ऊंचा करके वह नाचते हुए पकड़ेगा।
जिसके दर्शन करते ही प्राणियों को जन्म मरण के बंधन से शीघ्र मुक्ति मिल जाती है। अहो! कभी उसने स्वयं लकड़ी से निर्मित भौर को घूमाया था।
दाइयों ने तर्जनी उंगली से डांटकर मना करने पर भी वह शहाजी का पुत्र उस उसकी बाललीला में नकल करता था।
खाने के लिए बोलने पर वह खाता नहीं था, पीने के लिए बोलने पर वह पीता नहीं था और यदि दाइयों ने उसको प्यार से सोने के लिए बोलने पर भी वह सोता नहीं था।
उन-उन खेलों में आसक्त वह श्रेष्ठ संसार की आत्मा, मां के बुलाने पर भी दूर भाग जाती थी।
बालपन के खेलों के वशीभूत होकर वह शिवाजी जहां जहां जाता वहां वहां पर इंद्र आदि सभी देव उसकी रक्षा करते थे।
जो श्रीमान दया के सागर, देवों के आधारभूत, वेदों में वर्णित, पुराणों में विख्यात है ऐसे भगवान विष्णु ने पृथ्वी के भय को हरण करने के लिए शहाजीराजे के घर पर स्वयं अवत्तार लिया और उनको बालपन की शोभा के प्राप्त होने से वे अत्यधिक सुशोभित हो लगे।
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