पूरयद्भिर्धरान्यां च गभीरमधुरस्वरैः ।
सोभिमानपरोभेरीमन्वकार्षीत् कदाचन ।।
अपने गंभीर एवं मधुर स्वर से आकाश और पृथ्वी को ध्वनि युक्त करता हुआ वह कभी अभिमान से दुंदुभी जैसी आवाज करता था।
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