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शिवभारतम् • अध्याय 7 • श्लोक 24
अभ्रान्तोपिभ्रमरवद् भ्रमिं भ्रान्तः कदाचन। दृष्टो हय इवहेषामहेषत कदाचन ।।
वह भ्रम रहित होते हुए भी कभी भौर के समान भ्रांत होकर घूमता था, प्रसन्नचित्त होने पर वह कभी घोड़े की तरह जोर से हंसता था।
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