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अध्याय 27 — सप्तविंशतितम अध्याय

शिवभारतम्
42 श्लोक • केवल अनुवाद
पण्डित बोलें - अपने रखे हुए सैनिकों के कारण, दूर्जयी पन्हाळ के किल्ले से शिवाजी छः सौ पदाति सैनिकों के साथ निकलकर चले गए, इसका अन्दाज योगमाया से मूढ हुए जोहर को कैसे समझ में आया एवं अपने सैन्यबल से उसने कोन-सा प्रतीकार किया, यह सब वीर शिवाजी के यशरूपी क्षीर समुद्र में तैरने वाले हे परमानन्द तुम बताओ।
कवीन्द्र बोलें - जब शिवाजी ने स्वयं पन्हाळ के किल्ले से जाने की इच्छा की तभी उन्होंने जोहर को इस प्रकार से सन्देश भिजवाया था।
शिवाजी बोलें - आदिलशाह ने बुलाये हुए व मेरे आक्रमण के कारण क्रोधित मुगल मेरे देश पर आक्रमण कर रहे हैं।
इसलिए उनसे युद्ध करने के लिए मैं यहाँ से जा रहा हूँ, तब तू मेरे युद्धनिपुण योद्धाओं से यहाँ लड़ना।
या फिर मेरे साथ द्वन्द्व युद्ध करने की उत्सुकता यदि तुम्हें आज हो तो पन्हाळ के किल्ले के तलहटी में आ जाना।
अपनी-अपनी सेनाएं हमें दूर से देखें, हम दोनों तलवार से वार्ह पर आनन्द से लड़ेंगे।
उस कर्णपूर के कुशल स्वामी जोहर ने वह संदेश सुनकर भी मन भयत्रस्त होने के कारण अनसुना कर दिया।
तब से ही उस ने भाईजान आदि योद्धाओं को किले के चारों और कठोरता पूर्ण घेराबंदी करने को कहा।
तब चिटी भी बिना पता चले अंदर या बाहर न जा सके ऐसे तरीके से जोहर के सैनिकों ने वहाँ उस किल्ले की घेरबंदी की।
वहाँ घेराबंदी करके बैठे हुए उस शत्रु योद्धाओं को मानों अंधा करके शिवाजी अपने पराक्रम से वह घेरांबदी तोड़कर गया हो।
तदनन्तर वह सचमुच सात घंटों में ही ४० योजन मार्ग पार करके विशाल किल्ले पर पहुंच गया।
वह समाचार जानने वाले गुप्तचरों ने शिवाजी पन्हाळ के किले से चला गया, ऐसे जोहर को बताया।
तब मानो प्रलयकाल के सागर के भंवरे में फंसा हुआ जोहर स्वयं अत्यन्त दुःखी, मूढ होकर सभा में परेशान-सा था।
अरे इस किल्ले पर हमारे द्वारा बंदी बनाया हुआ शत्रु चकित करके आज यहाँ से अचानक निकलकर चला गया, इसे क्या बोलें हम।
अब मैं आदिलशाह को मुंह कैसे दिखाउं, यहाँ से आगे मेरा जीना केवल उपहास के लिए ही होगा।
यवनों का नाश करने वाला यह मेरे हाथ से निकल गया, ऐसा सुनकर शाएस्ताखान आदि भी मुझे क्या बोलेगा।
इस प्रकार बहुत देर तक पश्चाताप करके एवं बारंबार विचार करके वह नशे में चूर वीर सीद्दी मसूदास बोला।
जोहर बोला - थैली में स्थित रत्नों के समान अब यह शत्रु घेरे में से निकलने के कारण मेरे मन को अत्यधिक दुःख हो रहा है।
हम सबके देखने पर भी जो आज हमारे घतों से निकल गया है, उसका हे महाबाहु मसूद, जल्दी से पीछा करो।
अपने दूसरे कार्य में व्यस्त होने के कारण वह शिवाजी विशाल किल्ले पर ज्यादा समय नहीं बितायेगा, इसलिए तू शीघ्रता कर।
इस प्रकार उसके आज्ञा देने पर वह विशिष्ट पराक्रमी मसूद बड़ी सेना के साथ उस शत्रु का पीछा करने लगा।
कीचड़ के कारण मार्ग में उसके घोड़े छूटने तक धस गए एवं पदाति सैनिक भी घने काई में गिर गए।
मसूद आया हुआ सुनकर उस किल्ले पर रहने वाला पराक्रमी राजा शिवाजी लड़ने के लिए अच्छे से तैयार हुआ।
पल्लीवन पाली का राजा वीर जसवंत, श्रृंगापुर का राजा पराक्रमी सुर्याजी और अन्य भी सामंत, उस किल्ले की घेराबंदी करने के लिए उस दुरात्मा दुष्ट जोहर ने पहले ही नियुक्त किए हैं, वे बार-बार लड़ते हुए पद-पद पर पराजय को प्राप्त होने के कारण किल्ले पर चढ़ते हुए शिवाजी को रोक नहीं पाए।
उन सभी घमंडी राजाओं ने, उस अभिमानी मसूद से सेना सहित मिलकर, उस किल्ले को फिर से घेर लिया।
तदनन्तर क्रोध से लाल आंखों वाले शिवाजी के योद्धाओं ने उस किल्ले से नीचे उतरकर बादल के समान गर्जना करके दौड़कर जाकर, बड़ी सावधानी से, घेरने वाले उन शत्रुओं पर हमला करके कूद-कूदकर तीक्ष्ण तलवारों से काट दिए।
वहाँ पर बहुत से बर्बर शिवाजी के बलवान पदाति सैनिकों के तलवारों की धार से कटने के कारण, उन बर्बरों ने यमपुर का रास्ता पकड़ लिया।
वहाँ पर जसवंत, सुर्याजी एवं अन्य बहुत से सामृत पराक्रम को सहन न कर पाए।
भागकर जाने वाले, अपने सैनिकों को लौटाकर, शीघ्रकारी मसूद ने ग्रह-ग्रह पर जिस प्रकार हल्ला करता है, उसी प्रकार शत्रु पर हमला किया।
तब तलवरों से एवं शक्तियों से एक-दूसरे को ओर से मारने वाले उन दोनों के ही सेनाओं में बड़ा युद्ध हुआ।
तब बाहुबल के घमंड से उन्मत्त हुआ, विघ्नों के समान चलकर आये हुए उन बर्बरों को युद्धनिपुण शत्रुओं मराठाओं ने लुढ़का दिया।
विद्युतयुक्त बादल वृक्षों को तोड़कर व गरुड सांप को पकड़कर गर्जना करता है, उसी प्रकार शिवाजी के पदाती सैनिकों ने जीतकर गर्जना की।
उस समय फूटे हुए शिरस्त्राणें टुटे हुए हाथ, पैर, शिर, कंधे, जंघाए, ये सब उस युद्धभूमि पर बिखरे हुए थे।
ताजे घास से अत्यन्त हरी-भरी विशाल किल्ले की तलहटी की भूमि शत्रुओं के खून से शीघ्र ही लाल हो गई।
मनुष्यों व घोड़ों की जंघाए, घटने, पैर एवं शिर इसके कारण भूमि अदर्शनीय दिखने लगी।
इस प्रकार से अपने सम्पूर्ण सैन्य बल को अपने हाथ से शिवाजी के क्रोधरूपी समुद्र में डुबोकर लज्जित हुआ मसूद, युद्धनिपुण शत्रुओं ने उपेक्षा कर जीवित छोड़ दिया एवं उसे अत्यधिक दुःख हुआ एवं अपनों के सामने खड़ा हुआ और वह शत्रुओं से परांगमुख हो गया।
उस युद्ध से पलायन करके आया हुआ एवं अपनों के सामने खड़ा हुआ वह मसूद मानो परलोक से आया है, ऐसा जोहर को लगा।
उसके बाद अपने राज्य की सीमा से पहले ही लाकर रखे हुए सैनिकों को लेकर वह स्वयं विशाल किले से चला गया।
आनन्दपूर्वक मार्ग में अनेक प्रकार के पांच-छः वस्तीयां बनाकर राजगड़ के राजा ने तुरन्त राजगड़ जाकर चमकने वाले किरणों के योग से चमकने वाले रत्नों से युक्त आसन पर बैठे हुए, कुलीन स्त्रियों से घिरे हुए कुलीन स्त्रियों के कुलदेवता, अनेक प्रकार के व्रतों को रखने वाली, रातदिन देवताओं की पूजा करने वाली, अनेक प्रकार के आशीर्वादों का देने वाले, सत्य एवं गंभीर भाषण करने वाली खुशी के आंसुओं से दीर्घ नेत्र जिसके नभ हो गए है, अंतःकरण में पुत्रप्रेम उमड़ गया है, जिसके दर्शनोत्सुक, स्तनों से बहने वाले अमृतमय दुध की धाराओं से मानो स्नान कराने वाली अपनी मां को वंदन किया।
तत्पश्चात् अनेक प्रकार के सभी वृतांतों बताने में उस विजयी शिवाजी ने सम्पूर्ण दिन उनसे समीप बिताया।
जब विजयी शिवाजी राजा अपने किल्ले में आया, तब दुंदुभि, मृदु एवं गंभीर आवाज में बजने लगे।
वहाँ स्थित बर्बर की सेना का, अपने बाहुबल से तुरन्त पराजय करके शिवाजी राजा पन्हाळ के किल्ले से अपने राजगड़ आया, तब सभी सैनिक साथ में होते हुए भी एवं अनेक प्रकार के प्रयत्नों में व्यस्त रहने पर भी दिल्लीपति के मामा शाएस्ताखान को अपना इष्ट हेतु प्राप्त होता है या नहीं, इस विषय में संदेह पैदा हुआ।
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