उरुभिर्जानुभिश्वापि तथा जंघाभिरन्ध्रिभिः। शिरोभिश्च नराश्वानां दुष्प्रेक्ष्या वसुधाभवत्।।
मनुष्यों व घोड़ों की जंघाए, घटने, पैर एवं शिर इसके कारण भूमि अदर्शनीय दिखने लगी।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।