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शिवभारतम् • अध्याय 27 • श्लोक 18
जोहर उवाच - ग्रन्थिस्थेनेव रत्नेन सपत्नेनाधुनामुना। निरोधपरिमुक्तेन बत मे दूयते मनः ।।
जोहर बोला - थैली में स्थित रत्नों के समान अब यह शत्रु घेरे में से निकलने के कारण मेरे मन को अत्यधिक दुःख हो रहा है।
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