आनन्दपूर्वक मार्ग में अनेक प्रकार के पांच-छः वस्तीयां बनाकर राजगड़ के राजा ने तुरन्त राजगड़ जाकर चमकने वाले किरणों के योग से चमकने वाले रत्नों से युक्त आसन पर बैठे हुए, कुलीन स्त्रियों से घिरे हुए कुलीन स्त्रियों के कुलदेवता, अनेक प्रकार के व्रतों को रखने वाली, रातदिन देवताओं की पूजा करने वाली, अनेक प्रकार के आशीर्वादों का देने वाले, सत्य एवं गंभीर भाषण करने वाली खुशी के आंसुओं से दीर्घ नेत्र जिसके नभ हो गए है, अंतःकरण में पुत्रप्रेम उमड़ गया है, जिसके दर्शनोत्सुक, स्तनों से बहने वाले अमृतमय दुध की धाराओं से मानो स्नान कराने वाली अपनी मां को वंदन किया।
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