मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिवभारतम् • अध्याय 27 • श्लोक 39
अथ स्वविषयोपांतादानायितचरां चमूम्। समादाय विशालाह्नात् पर्वतात् प्रस्थितः स्वयम् ।। उषित्वा वसतीस्तास्ताः सोत्सवे पथि पंचषाः। सद्यो राजगिरिं गत्वा राजा राजगिरीश्वरः ।। चंचन्मरीचिनिचयस्फुररत्नासनस्थिताम्। कुलखीभिः परिवृतां कुलस्त्रीकुलदेवताम् ।। तत्तद्व्रतवतीं नक्तंदिवमंचितदैवताम्। ददतीमाशिषस्तास्ताः सत्यगम्भीरभाषिताम्।। प्रमोदबाष्पप्रचयस्तिमितायतलोचनाम्। समुच्चलिवात्सल्यरसां सदर्शनोत्सुकाम्।। संप्रस्नुतस्तनस्तन्यधाराभिरमृतात्मभिः। स्नपयन्तीं महाबाहुर्जननीं स्वामवन्दतें ।।
आनन्दपूर्वक मार्ग में अनेक प्रकार के पांच-छः वस्तीयां बनाकर राजगड़ के राजा ने तुरन्त राजगड़ जाकर चमकने वाले किरणों के योग से चमकने वाले रत्नों से युक्त आसन पर बैठे हुए, कुलीन स्त्रियों से घिरे हुए कुलीन स्त्रियों के कुलदेवता, अनेक प्रकार के व्रतों को रखने वाली, रातदिन देवताओं की पूजा करने वाली, अनेक प्रकार के आशीर्वादों का देने वाले, सत्य एवं गंभीर भाषण करने वाली खुशी के आंसुओं से दीर्घ नेत्र जिसके नभ हो गए है, अंतःकरण में पुत्रप्रेम उमड़ गया है, जिसके दर्शनोत्सुक, स्तनों से बहने वाले अमृतमय दुध की धाराओं से मानो स्नान कराने वाली अपनी मां को वंदन किया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें