संवर्तसागरावर्तवर्तीव स ततः स्वयम्। तांतभावमधात्तत्र भ्रांतभ्रांतः सभांतरे ।।
तब मानो प्रलयकाल के सागर के भंवरे में फंसा हुआ जोहर स्वयं अत्यन्त दुःखी, मूढ होकर सभा में परेशान-सा था।
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