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अध्याय 2 — द्वितीय अध्याय

शिवभारतम्
67 श्लोक • केवल अनुवाद
जब शाहजी अपने पांचवें वर्ष में थे, राजा मालवर्मा ने
एक बड़ा और बढ़िया कवच तथा अपने पसंदीदा धनुष के साथ, निजाम शाह के आदेश पर एक बड़ी सेना के साथ इंदापुर पर चढ़ाई की।
वहां चारों ओर से घेरकर प्रहार करने वाले कई शक्तिशाली सैनिकों के साथ संपूर्ण शक्ति से युद्ध करते हुए
उसने पैदल सेना, मदमस्त हाथियों और घोड़ों के खून की एक बड़ी एवं तीव्रगामी नदी को बहा दिया।
यम की तरह क्रोधित एवं तेजस्वी, मालवर्मा ने शत्रु के योद्धाओं को पहले स्वर्ग भेजकर और उनका अनुसरण करते हुए वह भी स्वर्ग को प्राप्त हो गया।
वज्रपात की तरह उस भयानक खबर को सुनकर साध्वी उमा हवा से उखड़े केले की तरह जमीन पर गिर पड़ी।
सूर्य के वियोग में जैसे दिनश्री अंधकार में डूब जाती है वैसे ही आधारहीन उमा दुख के सागर में डूब गई।
फिर, उनकी स्वयं की आँखें आँसू से परिपूर्ण होने पर भी वे महान बुद्धिमान विठ्ठल जी पतिशोक से भयभीत तथा चकवी पक्षी की तरह विलाप कर रही,
अपने भाई की पत्नी को सांत्वना देने के लिए दबी आवाज में कहा,
हे महान मन वाली स्त्री, यह विधि निर्मित नश्वर संसार अनित्य है यह जानकर शोक मत करो। तुम्हारा पति अपना परिवार छोड़कर स्वर्ग चला गया है।
शत्रु को पीठ न दिखाने वाले वीर योद्धा युद्ध में शत्रु के शखों से मरना चाहते हैं।
जो वीर शीघ्र स्वर्ग जाकर अमृत पीना चाहते हैं, उनकी स्वार्थदृष्टि को वास्तव में रिश्तेदारों का प्रेम नहीं रोक सकता।
हाय हाय! जब छोटे बच्चों सहित आप साध्वी को छोड़कर तुम्हारा पति परलोक चला गया उस समय उनका दिल कठोर होना चाहिए।
वास्तव में, मानव शरीर नश्वर हैं, और भले ही वे महान प्रयास से सुरक्षित किए गए हो, लेकिन जीवन की रस्सी टूट जाने पर वे नष्ट हो जाते हैं।
उन्होंने डाक्टरों से इलाज कराकर शरीर को स्वस्थ रखा, महीन और मुलायम रेशमी कपड़े और सिचय से उन्हें ढक दिया,
हल्का, चिकना, मीठा, प्रिय, हितकारी, पौष्टिक, रसीलें पेय, आदि, विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों द्वारा उन्हें पुष्ट किया;
काले चन्दन के चूर्ण से बनी अगरबत्ती की सुगन्ध से सुगन्धित और दिव्य रत्नों से अलंकृत रमणीय महल में
शिरीष के फूल की तरह कोमल सुन्दर शय्या पर शयन कराया और जल छिड़के हुए शीतल शिशु के पंखे से हवा की।
सुंदरियों ने उनके पैरों को बार बार अपने करकमलों से रगड़ा, इस प्रकार उन पर अनेक प्रकार के उत्तम उपचार करके उनकी रक्षा की,
लेकिन, मानो कृतघ्नता के कारण यह शरीर किसी के साथ नहीं जाता! इसलिए इस संसार में कोई किसी का नहीं होता है यही सत्य है।
अनुकूल पत्नियां, गुणी पुत्र, प्रेममय माता-पिता, सहोदर भाई,
मित्र, शत्रु, संपत्ति, और विपत्ति ये तभी तक विद्यमान होते हैं, जब तक यह देह विद्यमान रहता हैं।
हे देवी, शाहजी और शरीफजी, आपके दोनों तेजस्वी पुत्र उदित होते हुए सूर्य तथा चन्द्रमा के समान सुशोभित हो रहे हैं।
वीर माता के गर्भ में जन्में कुलदीपक ये दोनों पुत्र विश्व भर में अद्भुत और दीप्तिमान सफलता बिखेरेंगे।
वे दोनों दुध पीते बच्चे की तरह बहुत छोटे हैं और उनका जीवन आप पर निर्भर है। ये लोग आपके बिना एक पल भी नहीं रह सकते।
तो अब यदि आप मेरे अनुरोध का पालन करते हैं, तो धैर्य रखें और उन दोनों को बचाने के लिए अपने प्राणों की रक्षा करें।
विठ्ठल जी ने उसे इस तरह से उसके वंश और विशेष रूप से राज्य की भलाई के लिए सांत्वना दी।
सदाचारिणी रानी उमाबाई ने अपने दो पुत्रों को देखकर, विलाप छोड़ दिया और अपने आप को जीवित रखा। (सती जाने का विचार छोड़ दिया)
हालाँकि महाबुद्धिमान विठ्ठलजी को बहुत दुख हुआ, लेकिन उन्होंने उसे नियंत्रित किया और अपने भाई के संपूर्ण अंत्येष्टि विधि को किया।
बाद में प्रतापी विठ्ठलजी ने शाहजी और शरीफजी के नाम पर राज्य पर शासन किया और संपूर्ण राज्य में स्थिरता लाई।
मालवर्मा के निधन की खबर सुनकर निजामशाह को भी लगने लगा कि उनकी सेना के पंख टूट गए हो।
तब मालवर्मा के दोनों पुत्रों शाहजी और शरीफ जी को विठ्ठलजी के साथ बुलाकर उदार निजामशाह ने उन्हें
स्वयं सांत्वना दी और अपने पिता की संपत्ति को भी उन्हें सौंप दिया। उसने सोने के गहने, सुंदर कपड़े,
कीमती रत्न और हाथी, पोड़ों से उनका सम्मान किया और उन्हें संतोष के साथ विदा किया।
उनके चचेरे भाई विट्ठलजी ने उन दोनों का पालन पोषण किया और फिर उनके शरीर पर एक विशेष तेज चमकने लगा।
शरीफजी के भाई शाहजी, जो उत्तम गुणों से संपन्न थे और जो सभी धनों के प्रतीक थे, उन्हें 'राजा' शब्द से पुकारने लगे। (वह राजा बन गये)
वे महाबाहु उमा के पुत्र शाहजी आयु से छोटे थे, लेकिन सभी सरदार उनको सम्मान के साथ नमस्कार करने लगे।
जैसे ही शहाजी के शरीर में किशोरावस्था आने लगी, मानो बाल्यावस्था कुछ कठिनाईयों को पाकर धीरे-धीरे हिचकिचाने लगी हो।
जैसे हाथी का झुंड गण्डस्थल के मदस्राव की धारा से सुशोभित होता है, वैसे ही नई फूटती हुई दाढ़ी से शाहजी का चेहरा, देवों के समान सुशोभित होने लगा।
इनकी कांति सोने की तरह थी, इनकी आंखें बड़ी थी और इनकी खूबसूरत नाक बहुत घुमावदार थी, जो तोतों के मन में भय पैदा कर रही थी।
शाहजी का मनोहारी मुख चंद्रमा को भी तिरस्कृत करने वाला था। उनकी भुजाएँ घुटने तक लंबी थी तथा उनका शरीर दिव्य था।
उत्तम गुणों से संपन्न, उदार, दयालु, युद्धकुशल, महाप्रतापी, वर के लक्षणों से संपन्न,
मालवर्मा के पुत्र शहाजी राजा को देखकर, कुबेर की तरह धनी यादव राजा ने, अनुकूल ग्रहों वाले ज्योतिषी द्वारा बताए गए क्षण में अपनी
विजयलक्षणा, कमलनेत्रा और कुल की शोभा को बढ़ाने वाली, कुलीना पुत्री जीजाजी को दहेज के साथ अर्पित किया।
जैसे शुभ्र एवं गहरी गंगा समुद्र से सुशोभित होती हैं, वैसे ही तेज पुंज से शोभायमान शरीरवाली गुणवती जीजाबाई, गुण गंभीर शाहजी को प्राप्त करके सुशोभित होने लगीं।
उस उच्च कुल की सुंदरी के कमल की तरह हाथ मानो धरती की शोभा हो। उसके चिकने, सुन्दर, काले बाल नितंब तक लुढ़क रहे थे। उसके भाल को देखकर ऐसा लग रहा था मानो अर्धचंद्राकार हो तथा उसकी भौहें धनुष की तरह थीं।
मानो वह मदन की असली शक्ति हो, उसकी आँखें कमल की तरह जलयुक्त, कान सुनहरे सीपों की तरह, नाक सीधी,
दाँत कुंद के ताजे फूलों की तरह सफेद, होंठ लाल, मुँह खिले हुए कमल के समान, कंठ शंख की तरह, और आवाज कोयल की तरह थी।
नवयौवन में प्रवेश किए हुए, उसकी भुजाएं कमल के कोमल तंतुओं की तरह नाजुक, उंगलियां एक विकसित कमल के समान लाल,
नाखून चिकने और लाल, नाभि गहरी, पेट पतला, जांघें केले के खंभे के समान सुंदर, टखनें अंदर छिपे हुए,
और पैरों पर राजलक्ष्मी का निशान दिखाई दे रहा था। वह सभी धनों की निधि थी तथा उसकी चोटी विभिन्न गहनों से भरी हुई,
सिर विभिन्न प्रकार के लाल चमकीले मोतियों एवं रत्नों की मालाओं एवं फुलों से सुशोभित,
माथे पर लटकते हुए रत्न, कानों के पास दिखाई देते मोतियों से गुंथे हुए कुंडल,
धारण किए गए मोतियों एवं रत्नों के बड़े हार एवं गुच्छे,
भुजाओं में बाजूबंद, हाथों में रत्नों से युक्त कंगन थे।
पतली कमर पर कमरबंद, पैरों में आवाज करते पायजेब, पैरों की उंगलियों में मूल्यवान रत्नों के आभूषण,
शरीर पर चमकने वाले रेशमी कपड़े तथा रत्नों से युक्त रेशमी चोली को धारण करने वाली उस प्रसन्नवदना जीजाबाई को
स्वयं प्रेममयी दृष्टि से देखता हुआ वह सूर्यवंश का दीपक और प्रसन्नवदन शहाजी, वाद्ययंत्रों के घोषों के साथ अपने घर लेके आया।
जब वह विनयशील जीजाबाई अपने पति के साथ घर में प्रविष्ट हुई तो वे दोनों लक्ष्मीनारायण की जोड़ी की तरह शोभा को धारण कर रहे थे।
जल्दी से इकट्ठी हुई तथा विस्मय से देखने वाली सुवासिनी स्त्रियों ने नीराजनविधि से उनकी आरती की।
जब उसने अभिवादन किया, तो उसको अनेक प्रकार के फलदायी आशीर्वाद मिलें। उस समय सास ने अपनी बहू को बड़ी कौतूहल की दृष्टि से उसकी ओर देखा।
जो अपनी सास की सेवा में तत्पर, पति से प्रेम पूर्वक वार्तालाप करनेवाली, चरित्र की रक्षा करने में दक्ष, विनय की प्रतिमूर्ति,
पतिव्रता स्त्रियों की पथ प्रदर्शिका, दोनों परिवारजनों द्वारा मान्य तथा अपने परिजनों को आनंदित करने वाली, ऐसी बहू का साध्वी स्त्रियों ने अतिशय अभिनंदन किया।
विश्वासनामक राजा की दुर्गा नाम की सुंदर एवं सहुणी बेटी शक्तिशाली शरीफजी को पत्नीरूपेण प्राप्त हुई।
सेवा करने वाली दुर्गा एवं सुंदर जिजाबाई, इन दोनों बहुओं से तथा अपने दोनों विनयशील बेटों से उमा को अतिशय आनंद की प्राप्ति होने लगी।
अमूल्य गुणों से सुशोभित दोनों बहुओं के संयोग से शोभायमान ये दोनों गुणी भाई अपनी यश एवं सफलता से तुरन्त ही संपूर्ण पृथ्वी को और अपनी माता को आनन्द देने लगे।
जैसे तेज हवा से आग तेज हो जाती है, वैसे ही अपने पराक्रमी भाई के साथ भीष्म से भी अधिक उग्र कर्म करनेवाला, प्रत्येक युद्ध का विजेता, धनुष-बाण को धारण करने वाला, अतुल बलवान शहाजीराजे, निजामशाह का प्रिय करने वाले सभी राजाओं से श्रेष्ठ, पृथुराजा की तरह पृथ्वी पर शासन करने लगा।
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