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शिवभारतम् • अध्याय 2 • श्लोक 66
अगणितगुणभाजी भ्रातरी तावमूभ्याम्। निरवधिकगुणाभ्यां भ्राजमानौ वधूभ्याम् ।। सपदि निजयशोभिः शोभामानामशेषाम्। भुवमपि जनयित्रीं नन्दयामासतुः स्वाम्।।
अमूल्य गुणों से सुशोभित दोनों बहुओं के संयोग से शोभायमान ये दोनों गुणी भाई अपनी यश एवं सफलता से तुरन्त ही संपूर्ण पृथ्वी को और अपनी माता को आनन्द देने लगे।
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