Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 89 — अथ श्वचक्राध्यायः
बृहत्संहिता
21 श्लोक • केवल अनुवाद
जिस समय मनुष्य, घोड़ा, हाथी, घड़ा, पर्याण, क्षीर (आक आदि), ईंट का ढेर, छत्र, शय्या, आसन, ऊखल, ध्वज, चामर, दूब और फूल वाले स्थान पर मूत्रत्याग कर कुत्ता गमन करने वालों के आगे होकर जाय, उस समय कार्य की सिद्धि, गीले गोबर पर मूत्रत्याग कर आगे होकर जाय तो मिष्टान्न भोजन की प्राप्ति तथा सूखी वस्तु पर मूत्रत्याग कर गमन करने वाले के आगे होकर जाय तो सूखे अन्न, गुड़ और मोदकों की प्राप्ति होती है।
यदि कुत्ता मुख से जूते को ग्रहण करके गमन करने वाले के समीप आ जाय तो कार्य की सिद्धि, मांस लेकर आ जाय तो धन की प्राप्ति, आर्द्र हड्डी लेकर आ जाय तो शुभ-प्राप्ति, जला हुआ काष्ठ या सूखा मांस लेकर आ जाय तो गमन करने वाले की मृत्यु और अग्निरहित उल्मुक (जला हुआ काष्ठ) लेकर आ जाय तो उपद्रव होता है। यदि मनुष्य के शिर, हाथ, पाँव आदि कोई अवयव मुख में लेकर आ जाय तो भूमि क प्राप्ति तथा वत्र, बल्कल आदि लेकर आ जाय तो मृत्यु होती है। कोई-कोई वखसहित कुत्ते को आगे आने में शुभ फल कहते हैं। यदि सूखी हुई हड्डी लेकर कुत्ता घर में प्रवेश करे तो गृहपति की मृत्यु होती है। यदि जझीर, पुरानी लता, चमड़े की रस्सी आदि लेकर आगे आ जाय तो गमन करने वाले को नन्धन होता है। यदि गमन करने वाले के पाँव चाटे या अपने कान को पटपटाते हुये गमन करने वाले के ऊपर चढ़ने की इच्छा करे तो यात्रा में विघ्न होता है। यदि गमन करने वाले के मार्ग का विरोध करे या अपने अङ्ग को खुजलाये तो मार्ग में विरोध होता है। यदि गमन करने वाले या एक जगह पर स्थित मनुष्य के आगे में ऊपर पाँव करके सो जाय तो सदा दोषकारी होता है।
यदि सूर्योदय के समय एक या बहुत से कुत्ते इकट्ठे होकर सूर्य की तरफ मुख करके रुदन करें तो शीघ्र हो देश में अन्य स्वामी होने को सूचित करते हैं।
यदि अग्निकोण में स्थित कुत्ता सूर्य की तरफ मुख करके रुदन करे तो शीघ्र ही चोर और अग्नि का भय, मध्याह काल में सूर्य की ओर मुख करके रुदन करे तो अग्नि का भय और मृत्यु तथा अपराह में सूर्वाभिमुख होकर रुदन करे तो सथिरसाव के साथ लड़ाई को सूचित करता है।
सूर्यास्त काल में सूर्य की तरफ मुख करके कुत्ता रुदन करे तो किसानों को शीघ्र भय तथा प्रदोषकाल में वायव्य कोण में स्थित होकर रुदन करे तो वायु और चोरों से भय देता है।
यदि आधी रात में उत्तर की तरफ मुँह करके कुत्ता रुदन करे तो ब्राह्मणों को पीड़ा और गायों की चोरी होने को सूचित करता है। यदि रात्रि के अन्त में ईशान कोण की तरफ मुख करके कुत्ता रुदन करे तो कुमारी को दूषित, अग्नि का भय और स्त्रियों का गर्भपात कराता है।
यदि वर्षाकाल में तृण से बने हुये गृह, प्रासाद या उत्तम गृह में स्थित होकर कुत्ता ऊँचे स्वर से शब्द करे तो अत्यधिक वृष्टि को सूचित करता है तथा अन्य ऋतु में पूर्वोक्त स्थान में स्थित होकर शब्द करे तो मृत्यु, अग्निभय और रोगभय को सूचित करता है।
यदि वर्षाकाल में अनावृष्टि होने पर कुत्ता जल में स्नान करके बार-बार पार्श्व परिवर्तन और रेचन करता हुआ स्थित हो या ताड़ते हुये जल का पान करे तो बारह दिन पश्चात् वृष्टि होती है।
यदि कुत्ता द्वार पर शिर और बाहर शरीर को रखकर गृहस्वामी की गृहिणी को देखकर बार-बार रुदन करे तो उस गृहिणी को वेश्या कहता है।
जब घर की दीवार की लिपाई को कुत्ता खोदे तो उस समय उस घर में सन्धिभेद का भय होता है। यदि गायों के निवासस्थान को खोदे तो गोहरण और धान्य वाली भूमि को खोदे तो धान्य का लाभ होता है।
यदि कुत्ते की एक आँख अश्रुपूर्ण और थोड़ी दृष्टि वाली हो तथा वह थोड़ा भोजन करे तो घर को दुःखी करने वाला होता है। यदि गायों के साथ कुत्ता खेले तो सुभिक्ष, क्षेम, आरोग्य और हर्पित करता है।
यदि कुत्ता बाँई जांप को सूपे तो धनलाभ, दाहिनी जाँघ को सूधे तो खियों के साथ कलह, बाई करु को सूपे तो बुद्धीन्द्रियों के विषयों का उपभोग और दाहिनी ऊरु सेनेोतियों में यिोग होता है।
यदि कुत्ता गमन करने वाले के दोनों पाँवों को सूपे तो यात्रा का निषेध करता है। यदि वहीं पर गमन करने वाला निश्चल होकर स्थित हो जाय तो अभीष्ट अर्थ की सिद्धि करता है तथा यदि एक स्थान में स्थित गमन करने वाले के जूते को सूचे तो शीघ्र यात्रा को सूचित करता है।
यदि गमन करने वाले की दोनों भुजाओं को कुत्ता सूपे से शत्रु और चोर का भय जानना चाहिये। यदि भस्म में अपने खाने की वस्तु, मांस या हड्डी को छिपावे तो शीघ्र अग्निकोप होता है।
पहले कुत्ता गाँव में शब्द करके बाद में श्मशान में जाकर शब्द करे तो प्रधान पुरुष का नाश होता है। यदि गमन करने वाले के सम्मुख आकर कुत्ता रुदन करे तो यात्रा को रोकता है।
यदि कुत्ता उकार वर्ण से या गमन करने वाले के वाम पार्श्व में होकर ओकार वर्ण से शब्द करे तो अर्थ-सिद्धि और औकार वर्ण से शब्द करे तो आकुलता होती है तथा गमन करने वाले के पीछे की ओर होकर किसी भी वर्ण से शब्द करे तो उसको यात्रा का निषेध करता है।
यदि सभी कुत्ते दण्डों से ताड़ित की तरह ऊँचे स्वर से बार-बार 'खंख' शब्द करें या सभी कुत्ते इकट्ठे होकर एक साथ दौड़ें तो वे नगर को शून्यता और मृत्युभय को सूचित करते हैं।
यदि कुत्ता दाँतों को बाहर निकाल कर ओठ के अन्त भाग को चाटे तो कुत्ते की चेष्टाओं को जानने वाले मिष्टात्र का लाभ कहते हैं तथा मुँह को जब चाटता हो, उस समय यदि ओठ के अन्त भाग को नहीं चाटता हो तो भोजन के लिए तैयार पुरुष के अत्र में विघ्न डालता है।
गाँव या पुर के मध्य में। कुत्ते मिल कर बार-बार शब्द करें तो वे गाँव के स्वामी को क्लेश की सूचना देते हैं। वन में स्थित कुत्ते के फलों का विचार मृग की तरह करना चाहिये, अर्थात् 'ओजाः प्रदक्षिणं शस्ता मृगाः सनकुलाण्डजा:' इत्यादिवत् विचार करना चाहिये ।
यदि वृक्ष के समीप में कुत्ता शब्द को तो वर्ण होती है, इन्द्रकील के समीप में शब्द को तो मन्त्री को पीड़ा, गृह के मध्यान्य कोण में स्थित होकर शब्द करे तो पाना को भष और पुरद्वार में स्थित होकर शब्द करे तो पुर को पीड़ा होती है।
भर्य च शय्यासु तदीश्वराणां याने भषन्तो भयदाच पधात्। अथापसव्या जनसप्रिवेशे भयं भपन्तः कथयन्त्यरीणाम् ॥
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें