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बृहत्संहिता • अध्याय 89 • श्लोक 13
पादौ जिप्रेद्यायिनश्चेदयात्रां प्राहार्थाप्तिं वाञ्छितां निश्चलस्य । स्थानस्थस्योपानहौ चेद्विजिप्रेत्क्षिप्रं यात्रां सारमेयः करोति ॥
यदि कुत्ता गमन करने वाले के दोनों पाँवों को सूपे तो यात्रा का निषेध करता है। यदि वहीं पर गमन करने वाला निश्चल होकर स्थित हो जाय तो अभीष्ट अर्थ की सिद्धि करता है तथा यदि एक स्थान में स्थित गमन करने वाले के जूते को सूचे तो शीघ्र यात्रा को सूचित करता है।
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