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बृहत्संहिता • अध्याय 89 • श्लोक 2
गमनमुखमुपानहं सम्प्रगृह्योपतिष्ठेद्यदा स्यात्तदा सिद्धये मांसपूर्णानने- ऽर्थाप्तिराद्रेण चास्थ्या शुभं साग्न्यलातेन शुष्केण चास्थ्ना गृहीतेन मृत्युः प्रशान्तोल्मुकेनाभिघातोऽथ पुंसः शिरोहस्तपादादिवक्त्रे भुवोऽभ्या- गमो वस्त्रचीरादिभिर्व्यापदः केचिदाहुः सवस्त्रे शुभम् । प्रविशति तु गृहं सशुष्कास्थिवक्त्रे प्रधानस्य तस्मिन् वधः शृङ्खलाशीर्ण- वल्लीवरत्रादि वा बन्धनं चोपगृह्योपतिष्ठेद्यदा स्यात् तदा बन्धनं लेढि पादौ विधुन्वन् स्वकर्णावुपर्याक्रमंश्चापि विघ्नाय यातुर्विरोधे विरोधस्तथा स्वाङ्गकण्डूयने स्यात् स्वपंश्चोर्ध्वपादः सदा दोषकृत् ॥
यदि कुत्ता मुख से जूते को ग्रहण करके गमन करने वाले के समीप आ जाय तो कार्य की सिद्धि, मांस लेकर आ जाय तो धन की प्राप्ति, आर्द्र हड्डी लेकर आ जाय तो शुभ-प्राप्ति, जला हुआ काष्ठ या सूखा मांस लेकर आ जाय तो गमन करने वाले की मृत्यु और अग्निरहित उल्मुक (जला हुआ काष्ठ) लेकर आ जाय तो उपद्रव होता है। यदि मनुष्य के शिर, हाथ, पाँव आदि कोई अवयव मुख में लेकर आ जाय तो भूमि क प्राप्ति तथा वत्र, बल्कल आदि लेकर आ जाय तो मृत्यु होती है। कोई-कोई वखसहित कुत्ते को आगे आने में शुभ फल कहते हैं। यदि सूखी हुई हड्डी लेकर कुत्ता घर में प्रवेश करे तो गृहपति की मृत्यु होती है। यदि जझीर, पुरानी लता, चमड़े की रस्सी आदि लेकर आगे आ जाय तो गमन करने वाले को नन्धन होता है। यदि गमन करने वाले के पाँव चाटे या अपने कान को पटपटाते हुये गमन करने वाले के ऊपर चढ़ने की इच्छा करे तो यात्रा में विघ्न होता है। यदि गमन करने वाले के मार्ग का विरोध करे या अपने अङ्ग को खुजलाये तो मार्ग में विरोध होता है। यदि गमन करने वाले या एक जगह पर स्थित मनुष्य के आगे में ऊपर पाँव करके सो जाय तो सदा दोषकारी होता है।
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