यदि वर्षाकाल में अनावृष्टि होने पर कुत्ता जल में स्नान करके बार-बार पार्श्व परिवर्तन और रेचन करता हुआ स्थित हो या ताड़ते हुये जल का पान करे तो बारह दिन पश्चात् वृष्टि होती है।
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