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बृहत्संहिता • अध्याय 89 • श्लोक 4
सूर्योन्मुखः श्वानलदिक्स्थितश्च चौरानलत्रासकरोऽचिरेण । मध्याह्नकालेऽ नलमृत्युशंसी सशोणितः स्यात् कलहोऽपराह्न ॥
यदि अग्निकोण में स्थित कुत्ता सूर्य की तरफ मुख करके रुदन करे तो शीघ्र ही चोर और अग्नि का भय, मध्याह काल में सूर्य की ओर मुख करके रुदन करे तो अग्नि का भय और मृत्यु तथा अपराह में सूर्वाभिमुख होकर रुदन करे तो सथिरसाव के साथ लड़ाई को सूचित करता है।
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