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अध्याय 81 — अथ मुक्तालक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
36 श्लोक • केवल अनुवाद
हाथी, सर्प, सीपी, शंख, मेघ, बांस, मछली और सूअर से मोती की उत्पत्ति होती हैं। उनमें से सीपी से उत्पत्र मोती को सबसे उत्तम कहा गया है।
सिंहलक देश, परलोक देश, सुराष्ट्र देश, ताम्रपणों नदी, पारशव देश, कौबेर देश, पाण्डपवाटक देश और हिम-ये आठ मोतियों के आकरस्थान हैं।
सिंहलक देश में अनेक आकृति वाले, स्निग्ध, हंस के समान सफेद और स्थूल मोती उत्पन्न होते हैं। ताम्रपर्णी नदी में कुछ लाल, सफेद और निर्मल मोती निकलते हैं।
परलोक देश में काले, सफेद, पोले, कंकड्युत और विषम मोती होते हैं। सौराष्ट्र देश में न बहुत मोटे, न बहुत छोटे और मक्खन के समान कान्ति वाले मोती होते हैं। पारशव देश में तेजोयुक्त, सफेद, भारी और अधिक गुण वाले मोती होते हैं।
हिम में छोटे, जर्जर, दही के समान कान्ति वाले, बड़े और श्रेष्ठ आकृति वाले मोती होते हैं।
कौबेर देश में विषम, काले, सफेद, हलके और अति तेजस्वी मोती होते हैं। पाण्ड्य देश में' निम्बफल के समान, तीन पुटों से युत, धान्यक फल के समान और अति सूक्ष्म मोती उत्पत्र होते हैं।
अलसी-पुष्प के समान श्याम वर्ण के मोतियों का देवता विष्णु, चन्द्र की कान्ति के समान मोती का देवता इन्द्र, हरिताल के समान मोती का देवता वरुण, काले वर्ण के मोती का देवता यम
पके हुये अनार के बीज या चोंटनी (करजनी) के समान रक्त वर्ण वाले मोती का देवता वायु तथा धूमरहित अग्नि या कमल के समान कान्ति वाले मोती का देवता अग्नि कहा गया है।
चार मासे के बराबर तजोगुणयुक्त एक मोती का मूल्य ५३०० कार्षापण होता है तथा चार मासे तुल्य मोती में आधे-आधे कम करने पर क्रमशः ३२००, २०००, १३००, ८००, ३५३ कार्षापणतुल्य मूल्य होते हैं।
जैसे-साढ़े तीन मासे तुल्य एक मोती का मूल्य ३२००, सीन माशे तुल्य एक मोती का मूल्य २०००, ढाई माशे तुल्य एक मोती का मूल्य १३०० कार्षापण इत्यादि होते हैं।
एक माशे तुल्य एक मोती का मूल्य १३५, पाँच कृष्णला (गुडा) तुल्य मोती का मूल्य ९०, साढे तीन गुञ्जा तुल्य मोती का मूल्य ७०
तीन गुञ्जा तुल्य एक मोती का मूल्य ५० और ढाई गुञ्जा तुल्य एक मोती का मूल्य ३५ कार्षापण होता है।
यदि एक धरण (पल के दशमांश) तुल्य तौल में तेरह मोती चढ़ें तो उनका मूल्य २०० रुपये, बीस मोती चढ़ें तो उनका मूल्य १३० रुपये,
तीस मोती चढ़ें तो उनका मूल्य ७० रुपये, ४० चढ़ें तो उनका मूल्य ५० रुपये, पैंतालीस मोती चढ़ें तो उनका मूल्य ४० रुपये, अस्सी मोती चढ़ें तो
३० रुपये, सौ मोती चढ़े तो उनका मूल्य २५ रुपये, दो सौ रेती चढ़ें तो उनका मूल्य १२ रुपये, तीन सौ मोतो चढ़ें तो उनका
१२ रुपये, तीन सौ मोतो चढ़ें तो उनका मूल्य ६ रुपये, चार सौ मोती चढ़ें तो उनका मूल्य ५ रुपये और पाँच सौ मोती चढ़ें तो उनका मूल्य ३ रुपये होता है।
एक धरण पर १३ मोती चढ़े तो 'पिक्का', सोलह मोती चढ़े तो 'पिच्चा', पच्चीस मोती चढ़े तो 'अर्थ', तीस मोती चढ़े तो 'रखक', चालीस मोती चढ़े तो 'सिक्थ' और पचपन मोती चढ़े तो 'निगर' कहलाता है। इसके बाद अस्सी मोती से लेकर पाँच सौ तक एक धरण पर चढ़े तो उसको 'चूर्ण' कहते हैं ।
ये एक धरणतुल्य गुणयुक्त मोतियों के मूल्य कहे गये हैं। मध्य में व्यस्त त्रैराशिक से मूल्य का ज्ञान करना चाहिये। गुणहीन मोतियों के मूल्य में वक्ष्यमाण रोति से हानि करनी चाहिये।
कुछ काले, कुछ सफेद, कुछ पीले, कुछ लाल और कुछ विषम मोतियों का तृतीयांशोन पूर्वोक्त मूल्यतुल्य मूल्य होता है। विषम तथा पीले मोतियों का षष्ठांशोन पूर्वोक्त मूल्यतुल्य मूल्य होता है।
पुष्य या श्रवण नक्षत्र में, चन्द्र या रविवार में, उत्तरायण में, रवि और चन्द्र के ग्रहणकाल में ऐरावतकुल में उत्पत्र जिन भद्र हाथियों का जन्म होता है, उनके दन्तकोष या कुम्भों में बड़े-बड़े
ड़े-बड़े अनेक प्रकार के और कान्तियुक्त बहुत से मोती निकलते हैं। इनका मूल्य तथा इनमें छिद्र नहीं करना चाहिये।
उन प्रभायुक्त महापवित्र मोतियों को धारण करने से राजाओं को पुत्र, विजय और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
सूअर के दन्तमूल में चन्द्रप्रभा के समान कान्ति वाले, बहुत गुणों से युक्त मुक्ता- फल निकलते हैं तथा मछली से मछली के नेत्र के समान, स्थूल, पवित्र और बहुत गुणों से युक्त मुक्ताफल निकलते हैं।
वर्षाकालिक उपल (पत्थर) के समान, सप्तम वायु स्कन्ध से पतित, बिजली के समान, मेघ से उत्पन्न, आकाश से गिरते हुये मोती का आकाशस्थित देवयोनियों के द्वारा ऊपर ही ऊपर हरण कर लिया जाता है ।
जो तक्षक और वासुकि के कुल में उत्पन्न स्वेच्छाचारी सर्प होते हैं, उनके फणों के अग्र भाग में स्निग्ध एवं नीली कान्ति वाले मोती उत्पन्न होते हैं।
यदि प्रशस्त भूमि पर चाँदी के पात्र में उस मोती को रख देने से अचानक वर्षा होने लगे तो नाग से उत्पन्न मोती जानना चाहिये।
विना मोल किये सर्वोत्पन्न मोती को धारण करने से राजाओं के विष और अलक्ष्मी का नाश, शत्रुओं को भय, यश का विस्तार तथा विजय करता है।
बाँस से उत्पन्न मोती कपूर या स्फटिक के समान कान्ति वाला, चिपटा और विषम होता है तथा शंख से उत्पन्न मोती चन्द्रमा के समान कान्ति वाला, गोल, चमकीला और सुन्दर होता है।
शंख, मछली, बाँस, हाथी, सूअर, सर्प और मेघ से उत्पन्न मोती छिद्र करने लायक नहीं होते। अमित गुणों से समन्वित होने के कारण शास्त्रों में इसका मूल्य नहीं कहा गया है अर्थात् ये सभी अमूल्य होते हैं।
महान् गुणों वाले उपर्युक्त समस्त मोती राजाओं के लिये पुत्र, सौभाग्य और यश प्रदान करने वाले, रोग और शोक को हरण करने वाले एवं अभिलषित समस्त कामों को देने वाले होते हैं।
एक हजार आठ सही बाली मोतियों के माला की लम्बाई चार हाथ हो तो बह माता 'इन्दुच्छन्द' संज्ञक होती है।
यह देवताओं के भूषण के लिये होती है। पांच सौ चार लड़ी वाली माता की लम्बाई दो हाथ हो
तो विच्छन्द एक आठ सड़ी जाली अथवा इक्यासी लहीली माता की लम्बाई हो तो देवन्दसंज्ञा है।
चौमत लड़ी वाली भाला की संज्ञा 'अर्थहार' चौचन सदी वालीमा की 'शीमकता', बत्तीस लड़ी वाली माता को संज्ञा 'गुच्छ', बीस लड़ी
अर्थभावक, आत खड़ी वाली माता को 'मन्दर' और पाँच सालीमा को संज्ञा 'लक' है। हम ही एक हाथ लम्बी ताई मोतियों कमात् है।
पूर्वेत एक हाथ लम्बी माता के मध्य में मणियासुकीकपिरोई जव माला में मणियो तथा विषईजोको टुकार' एक केनेनेही' नाम से
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