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बृहत्संहिता • अध्याय 81 • श्लोक 24
वर्षोंपलवज्जातं वायुस्कन्याच्च सप्तमाद् भ्रष्टम् । ह्रियते किल खाद् दिव्यैस्तडित्प्रभं मेघसम्भूतम् ॥
वर्षाकालिक उपल (पत्थर) के समान, सप्तम वायु स्कन्ध से पतित, बिजली के समान, मेघ से उत्पन्न, आकाश से गिरते हुये मोती का आकाशस्थित देवयोनियों के द्वारा ऊपर ही ऊपर हरण कर लिया जाता है ।
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