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अध्याय 34 — अथ परिवेषलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
23 श्लोक • केवल अनुवाद
बायु के द्वारा मण्डलीभूत सूर्य और चन्द्र के किरणस्वरूप, मेघ वाले आकाश में प्रतिविम्बित होकर जो अनेक वर्ण के दिखाई देते हैं, उसी का नाम परिवेष है।
ये परिवेष इन्द्र, यम, वरण, निऋति, वायु, शिव, बढ़ा और अग्निकृत क्रम से रक्त, मोल, थोड़ा-सा बेत, कबूतर के रङ्ग, मेघ वर्ण, शवल (कृष्ण-चेत), हरे और खेत वर्ण के होते हैं। जैसे- इन्द्रकृत रक्त, यमकृत नील, बरुणकृत थोड़ा बेत, निऋतिकृत कबूतर के रङ्ग, यायुक्त मेध वर्ण, शिपकृत शवल, ब्रद्धाकृत हरा और अग्निकृत बेत वर्ष का रोता है।
कुबेर मेचक (मयूरकण्ठसदृश नील) वर्ण का परिवेष करता है। अन्य (इन्द्र आदि) मिले हुए रङ्ग के परिवेष करते हैं। जो परिवेष बार-बार उत्पन्न होकर नष्ट हो जाय, वह वायुकृत थोड़ा फल देने वाला होता है।
नीलकण्ठ, मपूर, घाँदी, तेल, दूध और जल के समान कान्ति बाला परिवेष मंदि क्रम से स्वकाल ( शिशिर आदि ऋतुओं) में उत्पत्र, जैसे- शिशिर ऋतु में नीलकण्ठ की तरह कान्ति बाला, बसन्त में मयूर की तरह कान्ति चाला, ग्रीष्म में चाँदी को तरह कान्ति बाला, वर्षा ऋतु में तेल की तरह कान्ति बाला, शरद् प्रऋतु में दूध की तरह कान्ति माला और हेमन्त ऋतु में जल के समान कान्ति बाला होकर अखण्ड मण्डलाकार और निर्मल हो जो लोगों का करात और सभिध करता है।
सम्पूर्ण आकाश में गमन करने वाला ( उदय से अस्त तक स्थिर रहने वाला), अनेक वर्ण बाला, रक्त वर्ण वाला, रूक्ष, अखण्डित तथा गाड़ी, धनुष या त्रिभुज की तरह आकृति बाला परिवेष अशुभ फल देने वाला होता है।
मयूरकण्ठ की तरह नील वर्ण का परिवेष अतिवृष्टि, अनेक वर्ण का परिवेष राजा का नारा, धूप वर्ग का परिवेष भय, इन्द्रधनुष की तरह और अशोकपुष्य की तरह अति लोहित कान्ति बाला परिवेष युद्ध करता है।
एक वर्ष याला, अधिक निर्मल और उस्तरे के समान मेघों से व्याप्त परिवेष अपने ऋतु में दिखाई दे तो शीघ्र दृष्टि करता है। यदि पीले वर्ण का परिवेष हो और उस समय के किशनीया हो भो भो वधि शीघ्र करता है।
यदि सूर्य की तरफ मुख किये हुये मृग और पक्षीगण के शब्दयुत, रूक्ष, तीनों सन्ध्याओं (प्रातः, मध्याह्न और सायं) में उत्पन्न और अतिविस्तृत परिवेष दिखाई दे तो भय करने वाला होता है।
यदि प्रत्येक दिन सूर्य का और रात्रि में चन्द्र का रक्त वर्ण का परिवेष दिखाई दे तो राजा का नाह करता है तथा सदा उदय या अरत काल में सूर्य या चन्द्र का परिवेष दिखाई दे तो भी राजा का नाश करता है।
दो मण्डल वाला परिवेष सेनापति को भय करने वाला होता है; किन्तु अधिक शलभय करने वाला नहीं होता। तीन आदि (तीन, चार, पाँच) मण्डल वाला परिवेष शखकोप, युवराज को भय और शत्रुओं से नगर का अवरोध कराता है।
यदि भौमादि कोई ग्रह, चन्द्र, कोई नक्षत्र- ये तीनों एक परिवेष में गत हों तो तीन दिन में वृष्टि और एक मास में लड़ाई होती है। जिस राजा का जन्मलग्नेश, जन्मराशीश या जन्मनक्षत्र परिवेश में हो, उस राजा को अशुभ फल होता है।
यदि परिषेप मण्डल में सानि पढ़ा हो तो छोटे धान्यें ( कौनी आदि) का नारा, यायुयुत वृष्टि, स्थावर ( वृक्ष आदि) की हानि और किसानों का नाश करता है।
मंगल पड़ा हो तो कुमार, सेनापति और सेनाओं को व्याकुल, अग्निभय और शखभय करता है। बृहस्पति पड़ा हो तो पुरोहित, मन्त्रों और राजाओं को पौड़ा होती है।
युध पड़ा हो तो मन्त्री, स्पायर ( वृक्ष आदि) और लेखक की वृद्धि तथा सुन्दर वृष्टि होती है। शुक्र पड़ा हो तो गमन करने वाले क्षत्रियों तथा रानियों को पीड़ा और दुर्भिक्ष होता है।
केतु पड़ा हो तो दुर्भिक्ष, अग्नि, मरण राजा और शस्त्र का भय होता है तथा परिवेष मण्डल में यदि राहु पड़ा हो तो गर्मभय, व्याधि और राजभय होता है।
यदि सूर्य या चन्द्र के परिवेष में दो ताराग्रह स्थित हों तो युद्ध, तीन हों तो दुर्भिक्ष और अवृष्टि का भय
चार हों तो मन्त्री और पुरोहित के साथ राजा की मृत्यु और सूर्य या चन्द्र के परिवेष में पाँच आदि ग्रह हों तो संसार का प्रलय ही जानना चाहिये।
यदि केतु का उदय न हुआ हो तब ताराग्रह या नक्षत्र अलग-अलग परिवेषयुत हों तो राजा का नारा करते हैं।
प्रतिपदा आदि चार तिथियों में यदि परिवेष दिखाई दे तो ब्राह्मण आदि चार वर्षों का नारा होता है। जैसे-प्रतिपदा में परिवेष दिखाई दे तो ब्राह्मणों का, द्वितीया में दिखाई दे तो क्षत्रियों का, तृतीया में दिखाई दे तो वैश्यों का और चतुर्थी में दिखाई दे तो शूद्रों का नाश होता है।
यदि पञ्चमी में परिवेष दिखाई दे तो श्रेणी (समान जातियों के संप) का, षष्ठी में दिखाई दे तो नगर का और सप्तमी में दिखाई दे तो कोश का अशुभ करने वाला होता है। यदि अष्टमी में परिवेष दिखाई दे तो युवराज का तथा नवमी, दशमी और एकादसी में दिखाई दे तो राजा का अशुभ करने वाला होता है।
द्वादशो में नगर का अवरोध और त्रयोदशी में सेनाओं में आकुलता होती है। यदि चतुर्दशी में दिखाई दे तो रानी को और पूर्णिमा में राजा को पीड़ा होती है।
यदि परिवेष के अन्दर रेखा दिखाई दे तो नगरवासियों का, बाहर दिखाई दे तो गमन करने वाले विजयेच्छु राजाओं का और परिवेष के मध्य में रेखा दिखाई दे तो आक्रन्द ( 'आक्रन्दो दारुणे रणे' इत्यमरः।
भयङ्कर युद्ध) की सार वस्तुओं (सेनाओं) का शुभाशुभ करने वाली होती है। जिसके भाग में लाल, काला या रूक्ष वर्ण का परिवेष हो, उसको पराजय होती है। जैसे-परिवेष के अन्दर लाल, काला, रूक्ष हो तो नगरवासियों की, बाहर में हो तो गमन करने वाले विजयेच्छु राजाओं की और परिवेष मध्य में लाल,
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