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बृहत्संहिता • अध्याय 34 • श्लोक 5
सकलगगनानुचारी नैकाभः क्षतजसन्निभो रूक्षः । असकलशकटशरासन शृङ्गाटकवत् स्थितः पापः ॥
सम्पूर्ण आकाश में गमन करने वाला ( उदय से अस्त तक स्थिर रहने वाला), अनेक वर्ण बाला, रक्त वर्ण वाला, रूक्ष, अखण्डित तथा गाड़ी, धनुष या त्रिभुज की तरह आकृति बाला परिवेष अशुभ फल देने वाला होता है।
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