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बृहत्संहिता • अध्याय 34 • श्लोक 4
चाषशिखिरजततैल क्षीरजलाभः स्वकालसम्भूतः । अविकलवृत्तः स्निग्धः परिवेषः शिवसुभिक्षकरः ॥
नीलकण्ठ, मपूर, घाँदी, तेल, दूध और जल के समान कान्ति बाला परिवेष मंदि क्रम से स्वकाल ( शिशिर आदि ऋतुओं) में उत्पत्र, जैसे- शिशिर ऋतु में नीलकण्ठ की तरह कान्ति बाला, बसन्त में मयूर की तरह कान्ति चाला, ग्रीष्म में चाँदी को तरह कान्ति बाला, वर्षा ऋतु में तेल की तरह कान्ति बाला, शरद् प्रऋतु में दूध की तरह कान्ति माला और हेमन्त ऋतु में जल के समान कान्ति बाला होकर अखण्ड मण्डलाकार और निर्मल हो जो लोगों का करात और सभिध करता है।
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