Krishjan
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अध्याय 2 — सांख्ययोग
भगवद गीता
73 श्लोक • केवल अनुवाद
संजय ने कहा—
उस प्रकार
करुणा से अभिभूत
,
आँसुओं से भरे और व्याकुल नेत्रों वाले
, तथा
शोक में डूबे हुए अर्जुन
से
मधुसूदन
(श्रीकृष्ण)
ने यह वचन कहा।
श्रीभगवान् ने कहा—
हे अर्जुन!
इस
संकटपूर्ण समय
में तुम्हें यह
मोह और दुर्बलता
कहाँ से प्राप्त हो गई? यह
आर्य पुरुषों के योग्य नहीं है
,
स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला नहीं है
, और
अपकीर्ति उत्पन्न करने वाला
है।
हे पार्थ!
तुम
कायरता
को प्राप्त मत हो; यह तुम्हारे योग्य नहीं है।
हे परन्तप
(शत्रुओं को संतप्त करने वाले)
! इस
तुच्छ हृदय-दौर्बल्य
का त्याग करके
उठो
और अपने कर्तव्य के लिए तैयार हो जाओ।
अर्जुन ने कहा—
हे मधुसूदन!
मैं युद्धभूमि में
भीष्म
और
द्रोणाचार्य
के साथ
बाणों द्वारा युद्ध
कैसे करूँ?
हे अरिसूदन!
वे दोनों तो
मेरे द्वारा पूजनीय
हैं।
इन
महानुभाव गुरुओं
का वध न करके, इस संसार में
भिक्षा से जीवन-यापन करना
भी अधिक श्रेयस्कर है। क्योंकि यदि हम
अर्थ और कामना में आसक्त
इन गुरुओं का वध करेंगे, तो यहाँ जो
भोग
प्राप्त होंगे, वे
रक्त से सने हुए
(पापमिश्रित)
ही होंगे।
हम यह भी नहीं जानते कि
हमारे लिए क्या अधिक श्रेयस्कर है—
हम उन्हें जीतें
अथवा
वे हमें जीत लें
। जिन
धृतराष्ट्र-पुत्रों
को मारकर हम
जीवित रहना भी नहीं चाहते
, वे ही आज हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।
कायरता और दीनता के दोष से अभिभूत होकर
मेरा
स्वभाव विचलित
हो गया है, और
धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहग्रस्त
हो गया है। अतः मैं आपसे पूछता हूँ कि
जो निश्चित रूप से मेरे लिए श्रेयस्कर हो
, वह मुझे बताइए। मैं
आपका शिष्य हूँ
; आपकी
शरण में आया हूँ
, अतः मुझे उपदेश दीजिए।
मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता, जो मेरे
इन्द्रियों को सुखा डालने वाले इस शोक
को दूर कर सके; चाहे मुझे
पृथ्वी पर निष्कण्टक और समृद्ध राज्य
प्राप्त हो जाए, अथवा
देवताओं के अधिपत्य
(स्वर्ग का सर्वोच्च राज्य)
की प्राप्ति ही क्यों न हो जाए।
संजय ने कहा—
इस प्रकार
हृषीकेश
(श्रीकृष्ण)
से कहकर,
गुडाकेश
(अर्जुन)
, जो
शत्रुओं को संतप्त करने वाले
(परन्तप)
हैं,
"मैं युद्ध नहीं करूँगा"
—ऐसा
गोविन्द
से कहकर मौन हो गए।
हे भारत
(धृतराष्ट्र)
! दोनों सेनाओं के मध्य
शोकग्रस्त और विषाद से भरे हुए अर्जुन
से
हृषीकेश
(श्रीकृष्ण)
ने, मानो
मंद मुस्कान के साथ
, यह वचन कहा।
श्रीभगवान् ने कहा—
तुम
उनके लिए शोक कर रहे हो
, जिनके लिए
शोक करना उचित नहीं है
, और साथ ही
पण्डितों के समान वचन
भी बोल रहे हो। परन्तु
ज्ञानी पुरुष
न तो
मृत व्यक्तियों
के लिए शोक करते हैं और न ही
जीवित व्यक्तियों
के लिए।
ऐसा कभी नहीं था कि
मैं नहीं था, या तुम नहीं थे, अथवा ये
राजागण
नहीं थे; और न ही ऐसा होगा कि
इसके बाद हम सब
अस्तित्व में नहीं रहेंगे।
जैसे
इस शरीर में स्थित देही
(आत्मा)
को
बाल्यावस्था
,
यौवन
और
वृद्धावस्था
की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार उसे
दूसरे शरीर की प्राप्ति
भी होती है।
धीर पुरुष
(तत्त्वज्ञानी)
इस विषय में
मोह को प्राप्त नहीं होता
।
हे कौन्तेय!
इन्द्रियों और विषयों के
संयोग
से उत्पन्न होने वाले
शीत-उष्ण तथा सुख-दुःख
देने वाले अनुभव
आने-जाने वाले
और
अनित्य
हैं। अतः
हे भारत!
तुम उन्हें
धैर्यपूर्वक सहन करो
।
हे पुरुषर्षभ
(श्रेष्ठ पुरुष अर्जुन)
! जिस
धीर पुरुष
को ये
सुख और दुःख
विचलित नहीं करते, और जो
सुख-दुःख में समभाव
रखता है, वह
अमृतत्व
(मोक्ष)
का अधिकारी होता है।
असत्
(जो नित्य नहीं है, मिथ्या है)
का कभी
वास्तविक अस्तित्व
नहीं होता, और
सत्
(जो नित्य और सत्य है)
का कभी
अभाव
नहीं होता। इन दोनों का
यथार्थ स्वरूप और सीमा
तत्त्वदर्शी महापुरुषों
द्वारा भली-भाँति देखी गई है।
उस तत्त्व को तुम अविनाशी जानो
, जिससे यह
सम्पूर्ण जगत् व्याप्त
है। उस
अव्यय
(अक्षय और अविनाशी)
तत्त्व का
विनाश
करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
इन
शरीरों
को
नश्वर
कहा गया है, जबकि इनमें स्थित
शरीरी
(आत्मा)
नित्य
,
अविनाशी
और
अप्रमेय
(इन्द्रियों और साधनों से न मापी जा सकने वाली)
है। अतः
हे भारत!
तुम
युद्ध करो
।
जो
इस आत्मा को मारने वाला
समझता है, और जो
इसे मरा हुआ
मानता है, वे दोनों ही
यथार्थ को नहीं जानते
। यह
आत्मा न किसी को मारती है
और न ही
कभी मारी जाती है
।
यह
आत्मा
न कभी
जन्म लेती है
और न कभी
मरती है
। यह ऐसा नहीं है कि पहले नहीं थी और बाद में अस्तित्व में आई हो। यह
अजन्मा
,
नित्य
,
शाश्वत
और
पुरातन
है;
शरीर के नष्ट होने पर भी
इसका कभी
विनाश नहीं होता
।
हे पार्थ!
जो पुरुष इस
आत्मा को अविनाशी
,
नित्य
,
अजन्मा
और
अव्यय
(जिसका कभी क्षय नहीं होता)
जानता है, वह
किसे मार सकता है
और
किससे किसी का वध करा सकता है
?
जैसे
मनुष्य
पुराने और जीर्ण
वस्त्रों को त्यागकर
नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार
देही
(आत्मा)
पुराने और जीर्ण
शरीरों को त्यागकर
अन्य
नए शरीरों को ग्रहण
करती है।
किसी भी शस्त्र द्वारा आत्मा के टुकड़े नहीं किए जा सकते, न ही अग्नि आत्मा को जला सकती है, न ही जल द्वारा उसे गीला किया जा सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है।
यह
आत्मा
न काटी जा सकती है
,
न जलाई जा सकती है
,
न भिगोई जा सकती है
और
न सुखाई जा सकती है
। यह
नित्य
,
सर्वव्यापी
,
स्थिर
,
अचल
और
सनातन
है।
यह
आत्मा
अव्यक्त
(इन्द्रियों से ग्रहण न की जा सकने वाली)
,
अचिन्त्य
(मन की कल्पना से परे)
और
अविकार्य
(जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता)
कही गई है। अतः
इस प्रकार आत्मा के स्वरूप को जानकर
तुम्हें
शोक नहीं करना चाहिए
।
हे महाबाहो!
यदि तुम इस
आत्मा को नित्य जन्म लेने वाली
अथवा
नित्य मरने वाली
भी मानो, तब भी तुम्हें
इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए
।
जिसका जन्म हुआ है
, उसकी
मृत्यु निश्चित
है; और
जिसकी मृत्यु हुई है
, उसका
पुनर्जन्म भी निश्चित
है। अतः इस
अपरिहार्य सत्य
के विषय में तुम्हें
शोक नहीं करना चाहिए
।
हे भारत!
सभी
प्राणी
प्रारम्भ में
अव्यक्त
(अप्रकट)
होते हैं, मध्य में
व्यक्त
(प्रकट)
होते हैं, और अंत में पुनः
अव्यक्त
ही हो जाते हैं। अतः इस विषय में
शोक करने का क्या कारण है
?
कोई इस
आत्मा
को
आश्चर्य के समान
देखता है, कोई
आश्चर्य के समान
इसका वर्णन करता है, और कोई इसे
आश्चर्य के समान
सुनता है; परन्तु
सुनने पर भी
कोई-कोई इसे
यथार्थ रूप से नहीं जान पाता
।
हे भारत!
यह
देही
(आत्मा)
सभी प्राणियों के शरीर में
नित्य और अवध्य
(जिसका वध नहीं किया जा सकता)
है। अतः तुम्हें
किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए
।
और
अपने स्वधर्म
का विचार करके भी तुम्हें
विचलित नहीं होना चाहिए
; क्योंकि
क्षत्रिय
के लिए
धर्मयुक्त युद्ध
से बढ़कर कोई अन्य
कल्याणकारी कर्तव्य
नहीं है।
हे पार्थ!
इस प्रकार का
अपने आप प्राप्त हुआ
धर्मयुद्ध
, जो
स्वर्ग के द्वार को खोलने वाला
है,
भाग्यशाली क्षत्रियों
को ही प्राप्त होता है।
यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे
, तो
अपने स्वधर्म और कीर्ति
का त्याग करके
पाप
को प्राप्त हो जाओगे।
और
लोग तुम्हारी चिरस्थायी अपकीर्ति
का वर्णन करेंगे; तथा
सम्मानित पुरुष
के लिए
अपकीर्ति
तो
मृत्यु से भी अधिक दुःखद
होती है।
महारथी योद्धा
यह समझेंगे कि तुम
भय के कारण युद्ध से हट गए हो
; और जिनके बीच तुम पहले
सम्मानित
थे, उन्हीं की दृष्टि में तुम
तुच्छ
हो जाओगे।
तुम्हारे
शत्रु
तुम्हारी
सामर्थ्य की निन्दा करते हुए
तुम्हारे विषय में अनेक
अकथनीय और अपमानजनक वचन
कहेंगे। इससे बढ़कर
अधिक दुःखद
और क्या हो सकता है?
यदि
युद्ध में मारे जाओगे
, तो
स्वर्ग
को प्राप्त करोगे; और यदि
विजयी हो जाओगे
, तो
पृथ्वी का राज्य
भोगोगे। इसलिए,
हे कौन्तेय!
युद्ध करने का दृढ़ निश्चय करके उठ खड़े होओ
।
सुख-दुःख
,
लाभ-हानि
तथा
जय-पराजय
को
समान मानकर
युद्ध के लिए तत्पर हो जाओ। इस प्रकार कर्म करने पर तुम
पाप को प्राप्त नहीं होगे
।
हे पार्थ!
यह
सांख्य
(आत्मतत्त्व के ज्ञान)
के विषय में तुम्हें
बुद्धि
कही गई। अब
योग
(कर्मयोग)
के विषय में इस
बुद्धि
को सुनो, जिसके द्वारा युक्त होकर तुम
कर्मबन्धन
से मुक्त हो जाओगे।
इस
कर्मयोग
में
आरम्भ का नाश नहीं होता
और न ही इसमें
कोई प्रतिकूल फल
(प्रत्यवाय)
होता है। इस
धर्म
(कर्मयोग)
का
थोड़ा-सा भी आचरण
मनुष्य को
महान् भय
(संसाररूप जन्म-मृत्यु के भय)
से बचा लेता है।
हे कुरुनन्दन!
इस
कर्मयोग
में
निश्चयात्मक
(दृढ़ और एकाग्र)
बुद्धि
एक ही होती है; किन्तु
अस्थिर और अनिश्चित चित्त वाले लोगों
की बुद्धियाँ
अनेक शाखाओं में विभक्त
और
अनन्त
होती हैं।
हे पार्थ!
जो
अविवेकी लोग
,
वेदों के कर्मकाण्ड में आसक्त
रहते हैं और
"इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है"
ऐसा मानते हैं, वे इस प्रकार की
आकर्षक और पुष्पित वाणी
का वर्णन करते हैं।
वे
कामनाओं से प्रेरित
और
स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानने वाले
लोग, ऐसी वाणी कहते हैं जो
जन्म और कर्मफल देने वाली
है तथा
भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति
के लिए अनेक प्रकार की
विशेष क्रियाओं
का प्रतिपादन करती है।
भोग और ऐश्वर्य में आसक्त
तथा उस
पुष्पित वाणी
द्वारा जिनका
चित्त हर लिया गया है
, ऐसे लोगों की
निश्चयात्मक
(दृढ़ और एकाग्र)
बुद्धि
समाधि
(आत्मनिष्ठा)
में स्थिर नहीं हो पाती।
हे अर्जुन!
वेद
मुख्यतः
त्रिगुणों
(सत्त्व, रजस् और तमस्)
से सम्बन्धित विषयों का प्रतिपादन करते हैं। इसलिए तुम
त्रिगुणों से परे
हो जाओ,
द्वन्द्वों
(सुख-दुःख आदि)
से मुक्त रहो,
नित्य शुद्ध सत्त्व में स्थित
रहो,
योगक्षेम
(अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा)
की चिन्ता से रहित हो, और
आत्मस्वरूप में स्थित
रहो।
जितना प्रयोजन एक
कुएँ
से सिद्ध होता है, उतना ही प्रयोजन
चारों ओर जल से परिपूर्ण बड़े जलाशय
से भी सिद्ध हो जाता है। उसी प्रकार,
तत्त्व को जानने वाले ब्राह्मण
(ब्रह्मज्ञानी पुरुष)
के लिए
समस्त वेदों
का प्रयोजन उसी में समाहित हो जाता है।
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है
, उसके
फलों में कभी नहीं
। इसलिए तुम
कर्मफल की इच्छा से कर्म करने वाले
मत बनो, और तुम्हारी
अकर्म
(कर्तव्य कर्म न करने)
में भी आसक्ति न हो।
हे धनञ्जय!
आसक्ति का त्याग करके
योग में स्थित होकर
अपने
कर्तव्य कर्म
करो।
सफलता और असफलता
में
समभाव
रखो; क्योंकि यही
समत्व
(समदृष्टि)
योग
कहलाता है।
हे धनञ्जय!
फल की इच्छा से किया जाने वाला कर्म
,
बुद्धियोग
(समत्वबुद्धि-युक्त कर्मयोग)
की अपेक्षा अत्यन्त निम्न है। इसलिए तुम
समत्वबुद्धि की शरण ग्रहण करो
; क्योंकि
कर्मफल को ही लक्ष्य बनाने वाले
वास्तव में
कृपण
(अल्पदर्शी)
हैं।
समत्वबुद्धि से युक्त मनुष्य
इसी जीवन में
पुण्य और पाप
—दोनों का त्याग कर देता है। इसलिए
योग में स्थित हो जाओ
; क्योंकि
योग
(समत्वबुद्धि-युक्त कर्म)
ही
कर्मों में कौशल
है।
समत्वबुद्धि से युक्त मनीषीजन
कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल
का त्याग करके,
जन्मरूप बन्धन
से मुक्त हो जाते हैं और
समस्त दुःखों से रहित परम पद
को प्राप्त होते हैं।
जब तुम्हारी
बुद्धि
मोहरूपी दलदल
को पार कर जाएगी, तब तुम
जो कुछ सुनने योग्य है और जो सुन चुके हो
, उन सबके प्रति
वैराग्य
को प्राप्त हो जाओगे।
जब तुम्हारी
बुद्धि
,
विविध श्रुतियों
(परस्पर भिन्न प्रतीत होने वाले शास्त्रीय मतों)
से विचलित होना छोड़कर,
समाधि में निश्चल और अचल
हो जाएगी, तब तुम
योग
को प्राप्त हो जाओगे।
अर्जुन ने कहा—
हे केशव!
समाधि में स्थित
और
स्थितप्रज्ञ
(जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है)
पुरुष का
लक्षण
क्या है? वह
स्थितबुद्धि पुरुष
कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता-फिरता है?
श्रीभगवान् ने कहा—
हे पार्थ!
जब मनुष्य
मन में उत्पन्न होने वाली समस्त कामनाओं
का पूर्णतः त्याग कर देता है और
अपने आत्मस्वरूप में ही अपने द्वारा सन्तुष्ट
रहता है, तब उसे
स्थितप्रज्ञ
(स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी)
कहा जाता है।
जो पुरुष
दुःखों में विचलित नहीं होता
,
सुखों में जिसकी स्पृहा
(लालसा)
समाप्त हो चुकी है, तथा जो
राग
,
भय
और
क्रोध
से रहित है, वह
स्थिर बुद्धि वाला मुनि
(स्थितधी)
कहलाता है।
जो पुरुष
सभी विषयों में आसक्ति से रहित
रहता है, और
शुभ अथवा अशुभ
की प्राप्ति होने पर न तो
हर्षित होता है
और न ही
द्वेष करता है
, उसकी
प्रज्ञा
(बुद्धि)
स्थिर
मानी जाती है।
जब यह
मनुष्य
कछुए के समान
, जो अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, अपनी
इन्द्रियों को उनके विषयों से पूर्णतः हटा लेता है
, तब उसकी
प्रज्ञा
(बुद्धि)
स्थिर
मानी जाती है।
विषय
तो
इन्द्रिय-भोगों से दूर रहने वाले देही
(साधक)
से दूर हो जाते हैं, किन्तु
उनके प्रति आसक्ति
(रस)
बनी रहती है। परन्तु
परम तत्त्व का साक्षात्कार
हो जाने पर, उसका वह
रस
(आसक्ति)
भी निवृत्त हो जाता है।
हे कौन्तेय!
प्रयत्न करने वाले और
विवेकी पुरुष
का भी
चंचल और बलवान इन्द्रियाँ
उसके
मन को बलपूर्वक हर लेती हैं
।
उन
समस्त इन्द्रियों को संयम में रखकर
,
मुझमें परायण
होकर
योगयुक्त
रहना चाहिए। क्योंकि
जिस पुरुष की इन्द्रियाँ उसके वश में होती हैं
, उसकी
प्रज्ञा
(बुद्धि)
स्थिर
होती है।
जब मनुष्य
विषयों का निरन्तर चिन्तन
करता है, तो उन विषयों में
आसक्ति
उत्पन्न होती है।
आसक्ति
से
कामना
उत्पन्न होती है, और
कामना
से
क्रोध
उत्पन्न होता है।
क्रोध
से
मोह
उत्पन्न होता है,
मोह
से
स्मृति का भ्रम
होता है,
स्मृति के नष्ट होने से
बुद्धि का नाश
हो जाता है, और
बुद्धि के नाश
होने पर मनुष्य का
पतन
हो जाता है।
किन्तु
राग और द्वेष से रहित
,
अपने वश में रखी हुई इन्द्रियों
द्वारा विषयों में विचरण करने वाला, तथा
संयमित अन्तःकरण वाला पुरुष
अन्तःकरण की प्रसन्नता
(प्रसाद)
को प्राप्त करता है।
अन्तःकरण की प्रसन्नता
(प्रसाद)
प्राप्त होने पर उसके
समस्त दुःखों का नाश
होने लगता है; क्योंकि
प्रसन्न चित्त वाले पुरुष
की
बुद्धि शीघ्र ही स्थिर
हो जाती है।
अयुक्त
(असंयमित और असमाहित चित्त वाले)
पुरुष की
स्थिर बुद्धि
नहीं होती, और न ही ऐसे पुरुष में
आत्मतत्त्व की भावना
(गहन निष्ठा और अनुराग)
होती है।
भावना से रहित
पुरुष को
शान्ति
प्राप्त नहीं होती; और
जिसे शान्ति नहीं है
, उसे
सुख कहाँ से प्राप्त हो सकता है
?
क्योंकि
विषयों में विचरण करती हुई इन्द्रियों
में से जिस
इन्द्रिय का मन अनुसरण करता है
, वही उस मनुष्य की
प्रज्ञा
(विवेक-बुद्धि)
को उसी प्रकार हर लेती है, जैसे
जल में चलती हुई नाव
को
वायु
बहा ले जाती है।
इसलिए, हे महाबाहो!
जिस पुरुष की
इन्द्रियाँ
उनके
विषयों से सर्वथा संयमित
और
नियंत्रित
हैं, उसकी
प्रज्ञा
(स्थिर बुद्धि)
दृढ़तापूर्वक स्थापित होती है।
जो अवस्था
समस्त प्राणियों के लिए रात्रि के समान
(अज्ञान और अचेतना का विषय)
है, उसमें
संयमी पुरुष जागृत
रहता है। और जिस विषय में
सामान्य प्राणी जागृत
रहते हैं, वह
तत्त्वदर्शी मुनि
के लिए
रात्रि के समान
(अमहत्त्वपूर्ण और अज्ञानमय)
है।
जिस प्रकार
निरन्तर भरते रहने पर भी
अचल और अपनी मर्यादा में स्थित समुद्र
में अनेक
नदियों का जल
प्रवेश करता रहता है, परन्तु वह विचलित नहीं होता; उसी प्रकार
जिस पुरुष में सभी कामनाएँ प्रवेश करती हैं
, फिर भी जो
अविचलित रहता है
, वही
शान्ति
को प्राप्त करता है,
कामनाओं का इच्छुक
(कामकामी)
नहीं।
जो पुरुष
समस्त कामनाओं का त्याग करके
,
स्पृहारहित
(इच्छा और लालसा से मुक्त)
,
ममतारहित
और
अहंकाररहित
होकर व्यवहार करता है, वही
परम शान्ति
को प्राप्त करता है।
हे पार्थ!
यह
ब्राह्मी स्थिति
(ब्रह्मस्वरूप में स्थित होने की अवस्था)
है। इसे प्राप्त करके मनुष्य
फिर कभी मोहित नहीं होता
। और इस अवस्था में
अन्तकाल में भी स्थित रहकर
वह
ब्रह्मनिर्वाण
(ब्रह्मरूप मोक्ष)
को प्राप्त हो जाता है।
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