हे कुरुनन्दन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मक(दृढ़ और एकाग्र)बुद्धि एक ही होती है; किन्तु अस्थिर और अनिश्चित चित्त वाले लोगों की बुद्धियाँ अनेक शाखाओं में विभक्त और अनन्त होती हैं।
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