हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति(ब्रह्मस्वरूप में स्थित होने की अवस्था) है। इसे प्राप्त करके मनुष्य फिर कभी मोहित नहीं होता। और इस अवस्था में अन्तकाल में भी स्थित रहकर वह ब्रह्मनिर्वाण(ब्रह्मरूप मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
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