जब यह मनुष्यकछुए के समान, जो अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से पूर्णतः हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा(बुद्धि)स्थिर मानी जाती है।
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