उन समस्त इन्द्रियों को संयम में रखकर, मुझमें परायण होकर योगयुक्त रहना चाहिए। क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ उसके वश में होती हैं, उसकी प्रज्ञा(बुद्धि)स्थिर होती है।
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