गुरूनहत्वा हि महानुभावान्श्रे यो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।।
इन महानुभाव गुरुओं का वध न करके, इस संसार में भिक्षा से जीवन-यापन करना भी अधिक श्रेयस्कर है। क्योंकि यदि हम अर्थ और कामना में आसक्त इन गुरुओं का वध करेंगे, तो यहाँ जो भोग प्राप्त होंगे, वे रक्त से सने हुए(पापमिश्रित) ही होंगे।
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