मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
भगवद गीता • अध्याय 2 • श्लोक 64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।
किन्तु राग और द्वेष से रहित, अपने वश में रखी हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करने वाला, तथा संयमित अन्तःकरण वाला पुरुष अन्तःकरण की प्रसन्नता (प्रसाद) को प्राप्त करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
भगवद गीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

भगवद गीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें