हे धनञ्जय!आसक्ति का त्याग करकेयोग में स्थित होकर अपने कर्तव्य कर्म करो। सफलता और असफलता में समभाव रखो; क्योंकि यही समत्व(समदृष्टि)योग कहलाता है।
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