यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
जो पुरुष सभी विषयों में आसक्ति से रहित रहता है, और शुभ अथवा अशुभ की प्राप्ति होने पर न तो हर्षित होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा(बुद्धि)स्थिर मानी जाती है।
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