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अध्याय 5 — सूर्यग्रहणाधिकार:

सूर्य सिद्धांत
17 श्लोक • केवल अनुवाद
व्रिभोनलग्न के तुल्य रवि होने पर (खमध्य में) लम्बेन का अभाव होता है। अक्षांशों के और मध्यलग्न अर्थात्‌ दशम लग्न वा त्रिभोनलग्न के उत्तर क्रान्त्यंशों के समान होने पर (क्षितिज पर) नति का अभाव होता है। (अमान्तकालिक लग्न में तीन राशि घटाने से त्रिभोनलग्न होता है)।
देश और काल के अनुसार जिस प्रकार नति का सम्भव और त्रिभोनलग्न के पूर्वापर दिशा के अनुरोध से देशकाल विशेष से जैसे लम्बन उत्पन्न होता है उसका विवेचन करने जा रहा हूँ।
पर्वान्तकाल में स्वदेशीय उदयासुओं द्वारा लग्न साधन करना चाहिये। तदनन्तर उसकी ज्या को परमक्रान्तिज्या से गुणाकर लम्बज्या से भाग देने पर लब्धि उदय संज्ञिका लग्न की अग्रा होगी।
पर्वान्तकाल में लड्डोदयासुओं से पूर्वोक्त प्रकार से मध्यलग्न का साधन कर इस के क्रान्त्यंश और स्वदेशीय अक्षांशों का एकदिशा में योग और भिन्‍न दिशा में अन्तर करना चाहिये। इस प्रकार जो शेषांश दक्षिण अथवा उत्तर दिशा के हों उनकी ज्या को मध्यज्या कहते हैं।
मध्यज्या को उदयज्या से गुणाकर त्रिज्या का भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो
उसके वर्ग को मध्यज्या के वर्ग में घटाकर शेष का वर्गमूल लेने से दृक्‌क्षेप होता है। टूक॒क्षेप के वर्ग को त्रिज्यावर्ग में घटाकर शेष का वर्गमूल लेने से दृग्गतिसंज्ञक शंकु होता है।
दशमलग्न के नतांशों की भुजज्या और कोटिज्या को क्रम से स्थूल दूकक्षेप और दृग्गति कहते हैं।
एक राशिज्या के वर्ग में दृग्गतिज्या का भाग देने से लब्धि छेदसंज्ञक होती है। त्रिभोन लग्न और सूर्य के अन्तरांशों की ज्या में छेद का भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो वह त्रिभोनलग्न से पूर्वापर भाग में सूर्य-चन्द्र का घटिकादि लम्बन होता है।
मध्यलग्न अर्थात्‌ त्रिभोनलग्न से सूर्य अधिक हो तो दर्शान्तकाल में लूम्बन को हीन करना चाहिये यदि त्रिभोन लग्न से सूर्य न्‍्यून हो तो दर्शान्तकाल में छृम्बन को धन करना चाहिये। लम्बन संस्कृत दर्शान्त काल से पुन: पुन: तब तक लम्बन आदि सम्पूर्ण गणित करें। जब तक लम्बन आदि स्थिर न हो जाय अर्थात्‌ पूर्व तुल्य न हो जाय। इस प्रकार साधन किया हुआ स्थिरीभूत दर्शान्‍न्तकाल स्पष्ट दर्शान्तकाल होता है।
दृक॒क्षेप को सूर्यचन्द्र के गत्यन्तर से गुणाकर १५ से गुणित त्रिज्या से भाग देने पर लब्धि कलादि नति होती है।
दृक॒क्षेप में ७० का भाग देने से अथवा दृक॒क्षेप को ४९ से गुणाकर त्रिज्या का भाग देने से फल कलादि नति होती है।
मध्यज्या के दिशा के अनुसार नति की दिशा जाननी चाहिए। अर्थाद्‌ मध्यज्या दक्षिण हो तो नति भी दक्षिण और उत्तर हो तो उत्तर नति होती है। नति और चन्द्रशर का एक दिशा में योग और भिन्‍न दिशा में अन्तर करने से स्पष्ट शर होता है (यह चन्द्र शर मध्यग्रहणकालिक होता है)।
नति संस्कृत स्पष्टशर से चन्द्रग्रहणोक्त प्रकार से स्थित्यर्ध, मर्दार्ध, ग्रास, क्‍ सम्मीलन, उनन्‍्मीलन, वलन, इष्टपग्रास आदि का साधन करना चाहिए।
मानैक्यखण्ड के वर्ग में स्पष्टशर का वर्ग घटाकर मूल लेने से स्थित्यर्धकला होती हैं | इसको ६० से गुणाकर सूर्य-चन्द्र की गत्यन्तर कला से भाग देने से घटिकादिक स्थित्यर्ध होता है।
तिथ्यन्त अर्थात्‌ गणितागत दर्शान्तकाल में स्पर्शकालिक स्थित्यर्ध घटाकर तथा मोक्ष कालिक स्थित्यर्ध जोड़कर “एकज्यावर्गतश्छेद' इत्यादि प्रकार से असकृत्‌ स्पाशिकलम्बन और मौक्षिक लम्बन का साधन करना चाहिए।
पूर्वकपाल में मध्यकालिकलम्बन से स्पाशिकलम्बन अधिक और मौक्षिकलम्बन न्यून हो अथवा पश्चिमकपाल में मध्यलम्बन से स्पाशिकलंबन न्यून हो तथा मौक्षिकलंबन अधिक हो तो स्पाश्शिकलंबन और मध्यलंबन का तथा मध्यलूंंबन और मोक्षऊंबन का अन्तर क्रम से स्पर्शस्थित्यर्ध और मोक्षस्थित्यर्ध में जोड़ना चाहिए।
यदि पूर्वकपाल में मध्यलंबन से स्पार्शिकलंबन न्यून हो और मौक्षिकलंबन अधिक हो अथवा पश्वम कपाल में मध्यलूंबन से स्पा्शिकलंबन अधिक हो और मौक्षिकलंबन न्यून हो तो स्पाशिकलंबन और मध्यलंबन तथा मध्यलंबन और मौक्षिकलंबन का अन्तर अपने अपने स्थित्यर्धो में घटाना चाहिए। यह लम्बनान्तरों का संस्कार स्पर्श मध्य अथवा मध्य मोक्ष एक कपाल में होने पर होता है यदि कपालभेद हो अर्थात्‌ पूर्वकपाल में स्पर्श और पश्चिम कपाल में मध्य अथवा पूर्वकपाल में मध्य और पश्चिम कपाल में मोक्ष हो तब लम्बनों के योग का संस्कार होता है। ऐसे ही मर्दार्ध में भी उक्‍्तरीति से अपने अपने स्थित्यर्धों में संस्कार होता है।
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