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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 5 • श्लोक 4
नताशज्या साधनम्‌ तदा लड्ढेदयै्लग्न॑ मध्यसंज्ञ यथोदितम्‌ । तत्क्रान्त्यक्षांशसंयोगो दिक्साम्येडन्तरमन्यथा ॥ शेष नतांशास्तन्मार्वी मध्यज्या साउभिधीयते ।
पर्वान्तकाल में लड्डोदयासुओं से पूर्वोक्त प्रकार से मध्यलग्न का साधन कर इस के क्रान्त्यंश और स्वदेशीय अक्षांशों का एकदिशा में योग और भिन्‍न दिशा में अन्तर करना चाहिये। इस प्रकार जो शेषांश दक्षिण अथवा उत्तर दिशा के हों उनकी ज्या को मध्यज्या कहते हैं।
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