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अध्याय 4 — चतुर्थोऽध्यायः

श्वेताश्वतर
22 श्लोक • केवल अनुवाद
'वह' जो एकमेव अद्वितीय एवं रूप-वर्ण-विहीन है, वह अपने शक्तियोग से अनेक वर्ण, अनेक रूप धारण करने का निश्चय कर लेता है तथा स्वयं में अनेक पदार्थों को धारण कर लेता है, और अन्त में यह विश्व 'उसी' में विलीन हो जाता है, आदिकाल में केवल वही 'देव' विद्यमान था। 'वह' हमें शुभ एवं तेजस्वी बुद्धि से युक्त करे।
'वही' है अग्नि तथा 'वही' आदित्य है, 'वही' वायु है तथा 'वही' चन्द्रमा है; 'वही' 'प्रकाशमान' (शुक्र) है, 'वही' 'ब्रह्म' है, 'वही' जल है, तथा 'वही' प्रजाओं का 'पिता', प्रजापति है।
'तुम' ही स्त्री हो तथा 'तुम' ही पुरुष हो; 'तुम' ही कुमार हो एवं 'तुम' ही पुनः कुमारी कन्या हो; 'तुम' ही तो जरा-जीर्ण वृद्ध पुरुष हो जो अपने दण्ड के सहारे झुककर चलता है। अहो, 'तुम' ही तो जन्म लेते हो तथा सम्पूर्ण विश्व तुम्हारे ही नाना रूपों से परिपूर्ण है।
'तुम' ही नील-विहंग हो तथा हरित एवं लोहिताक्ष हो; तडित्-गर्भ हो तथा नाना ऋतुएँ एवं अनेक सागर हो। 'तुम' अनादि हो तथा 'तुम' विभुभाव से सर्वत्र विचरण करते हो जिससे सकल भुवनों का उद्भव हुआ है।
ऐसी 'एक' अजाता (अजन्मा) है जो श्वेत-कृष्ण एवं लोहितवर्णा है, जो निरन्तर अनेकरूपा प्रजाओं की सृष्टि करती जा रही है और उसका एक अजात (पुरुष) उसके साथ प्रेम में साहचर्य सुखभोग करता है; जब कि दूसरा अजात (पुरुष) उसके समस्त सुखों का भोग करके उसे त्याग देता है।
दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, जो साथ-साथ रहने वाले तथा परस्पर सखा हैं, समान वृक्ष पर ही आकर रहते हैं; उनमें से एक उस वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, दूसरा खाता नहीं है, केवल देखता है।
समान वृक्ष पर एक 'पुरुष' (आस्वाद लेने में) निमग्न है और वह 'अनीश' (स्वयं का ईश नहीं) होने के कारण, मोहवशात् शोक करता है; किन्तु जब वह उस अन्य 'पुरुष' को देखता है तथा उससे सायुज्य स्थापित कर लेता है जो 'ईश' है, एवं वह इस समस्त जगत् में 'उसकी' महिमा को जान जाता है, तब वह शोकरहित हो जाता है।
परम अक्षर 'व्योम' में जहाँ समस्त देवों ने अपना आसन ग्रहण कर लिया है, वहीं हैं ऋग्वेद की ऋचाएँ, तथा जो 'उसे' नहीं जानता वह ऋचाओं से क्या कर लेगा? वे जो 'उसे' जानते हैं, वास्तव में वे ही इस प्रकार आसीन हैं।
नाना छन्द, नाना यज्ञ, नानाविध धार्मिक कृत्य एवं व्रतादि, जो कुछ भी भूतकाल में हो चुका है तथा जो कुछ भविष्य में होने वाला है तथा वह सब जिसका उद्घाटन वेदों ने किया है, 'माया' के 'अधीश्वर' उससे इस समस्त विश्व की सृष्टि करते हैं, तथा एक अन्य है जिसे अपनी 'माया' से इसमें पूर्णतया आबद्ध रखते हैं।
माया को प्रकृति की शक्ति जानो तथा माया के अधीश्वर को 'महेश्वर' समझो; 'उसी' (महेश्वर) के अवयव रूप सम्भूतियों से यह समस्त जगत् व्याप्त है।
वह 'एकम्' (अद्वितीयम्) जो प्रत्येक योनि (गर्भ) में प्रवेश करता है तथा जिसमें यह समस्त जगत् संचित (एकत्रित) होता है तथा उसमें ही विघटित हो जाता है, उस अभीष्ट 'देव' का, जो हमारे ईश के रूप में है तथा हमें इष्ट वर प्रदान करने वाला है, उसका दर्शन करके मनुष्य आत्यन्तिक रूप से इस शान्ति को प्राप्त करता है।
वह जो देवो का प्रभव (जन्म) है तथा उनकी सत्ता का उद्भव है, जो विश्व का अधिपति है, 'रुद्र' है, 'महर्षि' -महान् द्रष्टा है, एवं जिसने जन्म ग्रहण करते हुए 'हिरण्यगर्भ' को देखा था,-वह हमें तेजस्वी तथा शुभ-बुद्धि से संयुक्त करे।
जो देवों का अधिपति है, जिसमें ये समस्त लोक आश्रित हैं, जो इन द्विपदों एवं चतुष्पदों पर शासन करता है, किस देव को हम अपनी हवि अर्पित करके पूजा करें?
इस महती अव्यवस्था (कलिल) के बीच जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म (सत्य) है, विश्व का जो अनेकरूपधारी स्रष्टा है, तथा जो 'एक' होते हुए भी समस्त विश्व को परिवेष्टित किये हुए है, उसे 'शिव'–मंगलकारी जानकर मनुष्य आत्यन्तिक रूप से शान्ति को प्राप्त करता है।
'काल-गति' में 'वही' भुवनों का रक्षक है, 'वही' विश्व का अधिपति है जो समस्त चराचर में गुह्यरूप से निहित है,-ब्रह्मर्षियों एवं देवतों ने जिसमें 'योग' के द्वारा सायुज्य प्राप्त किया है; इस रूप में 'उसे' जानकर मनुष्य 'मृत्यु' के पाश को छिन्न-भिन्न कर देता है।
वह 'देव' जो धी के ऊपर आयी मलाई के समान अतिसूक्ष्म है, जो 'शिव' है तथा समस्त चराचर में गुह्यरूप से निहित है, जो 'एक' होते हुए भी समस्त विश्व को परिवेष्टित किये हुए है, उस 'देव' को इस रूप में जानकर मनुष्य समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
यह 'देव' है, महान् आत्मा है, विश्वकर्मा समस्त जगत् का निर्माता है, सभी प्राणियों के हृदयों में सर्वदा आसीन है, हृदय, बुद्धि एवं मन के द्वारा उसको प्राप्त किया जाता है; जो ऐसा जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।
जब तम नहीं होता, वह न दिन है न रात्रि, न सत् है, न असत्, वह एकमेव परम मंगलकारी 'शिव' है,'वह'अक्षर है, 'सर्जनशील सूर्य' का वह परम प्रकाश है और उसी से वह प्राचीन 'प्रज्ञा' प्रसृत हुई है।
'उसको' न कोई ऊपर से पूर्णरूप से पकड़ सकता है, न समान धरातल पर (अगल-बगल से), न मध्य में; उसकी कोई छवि (प्रतिमा) नहीं बनायी जा सकती जिसका नाम है 'महान् यश'।
'इसका' रूप दृष्टि के सम्मुख नहीं रहता तथा कोई भी 'इसे' चक्षुओं से देख नहीं सकता किन्तु हृदयस्थित 'इस' हृदय तथा मन से जो ऐसा जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।
कदाचित् कोई आश्चर्यभाव से भरकर इसे 'अजात' मानकर इसकी शरण में जाता है। हे रुद्र, आपका जो कल्याणकारी दक्षिणमुख है, उससे सर्वदा मेरी रक्षा करिये।
(हे रुद्र) न हमारे पुत्रों को, न हमारे पौत्रों को, न हमारे जीवनों को, न हमारी गौओं को, न ही हमारे अश्वों को नष्ट करिये। हे रुद्र, अपने क्रोध में हमारे वीरों का वध मत करिये; हम हवि अर्पित करते हुए सर्वदा ही आपका आवाहन करते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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