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श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 18
यदाऽतमस्तान्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासच्छिव एव केवलः। तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी॥
जब तम नहीं होता, वह न दिन है न रात्रि, न सत् है, न असत्, वह एकमेव परम मंगलकारी 'शिव' है,'वह'अक्षर है, 'सर्जनशील सूर्य' का वह परम प्रकाश है और उसी से वह प्राचीन 'प्रज्ञा' प्रसृत हुई है।
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