यदाऽतमस्तान्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासच्छिव एव केवलः।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी॥
जब तम नहीं होता, वह न दिन है न रात्रि, न सत् है, न असत्, वह एकमेव परम मंगलकारी 'शिव' है,'वह'अक्षर है, 'सर्जनशील सूर्य' का वह परम प्रकाश है और उसी से वह प्राचीन 'प्रज्ञा' प्रसृत हुई है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
श्वेताश्वतर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
श्वेताश्वतर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।