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श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 10
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं च महेश्वरम्‌। तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्‌॥
माया को प्रकृति की शक्ति जानो तथा माया के अधीश्वर को 'महेश्वर' समझो; 'उसी' (महेश्वर) के अवयव रूप सम्भूतियों से यह समस्त जगत् व्याप्त है।
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