यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम्।
तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति॥
वह 'एकम्' (अद्वितीयम्) जो प्रत्येक योनि (गर्भ) में प्रवेश करता है तथा जिसमें यह समस्त जगत् संचित (एकत्रित) होता है तथा उसमें ही विघटित हो जाता है, उस अभीष्ट 'देव' का, जो हमारे ईश के रूप में है तथा हमें इष्ट वर प्रदान करने वाला है, उसका दर्शन करके मनुष्य आत्यन्तिक रूप से इस शान्ति को प्राप्त करता है।
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