मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 11
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम्‌। तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति॥
वह 'एकम्' (अद्वितीयम्) जो प्रत्येक योनि (गर्भ) में प्रवेश करता है तथा जिसमें यह समस्त जगत् संचित (एकत्रित) होता है तथा उसमें ही विघटित हो जाता है, उस अभीष्ट 'देव' का, जो हमारे ईश के रूप में है तथा हमें इष्ट वर प्रदान करने वाला है, उसका दर्शन करके मनुष्य आत्यन्तिक रूप से इस शान्ति को प्राप्त करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
श्वेताश्वतर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

श्वेताश्वतर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें