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श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 2
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः॥
'वही' है अग्नि तथा 'वही' आदित्य है, 'वही' वायु है तथा 'वही' चन्द्रमा है; 'वही' 'प्रकाशमान' (शुक्र) है, 'वही' 'ब्रह्म' है, 'वही' जल है, तथा 'वही' प्रजाओं का 'पिता', प्रजापति है।
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